आज कमाऊ विभाक के बड़े साहब निरंजन खरे की बेटी प्रगति की शादी बड़े धूमधाम से संपन्न हो गई थी ताज्जुब की बात तो ये थी की शादी में साहब की जेब से एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ था जबकि शादी में पूरी तीन करोड़ रुपये की पड़ी थी थे पूरे संभाज से पैसे इकठ्ठे किए गए थे अधीनस्थ कर्मचारियों तथा अधिकारियों से भी मोटी रकम वसूल की गई थी गिफ्ट तो इतने मिले थे जिसकी कोई गिनती नहीं थी साहब ने जो डिनर दिया था उसमें भी उनका एक रूपया भी खर्च नहीं हुआ था।
आम आदमी जहाँ बेटी की शादी मैं ऊपनी जीवन भर की पूँजी लुटा बैठता है वहीं खरे जी को यह शादी लाभदायक साबित हुई थी इससे वे बड़े ख़ुश नजर आ रहे थे।
निरंजन सर की बेटी की शादी में पिछले सात दिनों से भृत्य रामदयाल लगातार काम में जुटा रहा था बेटी की विदाई के बाद वो अपने घर आया था उसको साहब ने एक मिठाई का डब्बा तक नहीं दिया था शादी में दिन रात कठोर श्रम के बदले सिवाय उसे झिढ़किया॔ डाँट फटकार बेइज्जती के अलावा और कुछ नहीं मिला था साहब के मुँह से दो बोल उसकी तारीफ के लिए भी नहीं निकले थे पैसा देना तो दूर की बात है।
रामदयाल दुखी मन से अपनी पत्नी दीपिका से कह रहा था गत वर्ष जब अपनी बिटिया रजनी की शादी हुई थी तब तुझे याद है स्टॉफ की तरफ से क्या मिला था पत्नी बोली हाँ याद है पूरे स्टॉफ ने पचास पचास रुपये इकठ्ठे कर साढ़े ग्यारस सौ रुपये का लिफाफा पकड़ा दिया था। स्टॉफ के तीस लोगों ने खाना खाया था पूरे ग्यारह सौ रुपये की थाली थी पर किसी ने इस विषय में पूछा तक नहीं था। रामदयाल को अच्छी तरह याद हैं उसे अपनी बिटिया की शादी के लिए जो जी पी फ निकाला था उसके लिए भी उसे दसहजार रुपये देने पड़े थे। तब कहीं उसका बिल पास हुआ था। हाँलाँकि रामदयाल जी की बेटी के ससुराल वाले बहुत अच्छे थे उन्होंने दहेज की बिल्कुल माँग नही रखी थी फिर भी रामदयाल जी ने अपनी ओर से उन्हें खूब दहेज दिया था । इसके विपरीत साहब की बेटी की शादी में जो भोजन परोसा गया था उसका स्वाद अच्छा नहीं था जबकि रामदयाल की बेटी की शादी में दिए गए भोज को लोग आज तक नहीं भूले थे खरे साहब बढ़े हैं उनके तो दुर्गुण भी लोगों को अच्छे लगते थे और उसका भला स्वभाव भी किसी गिनती में नहीं आता था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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