बंशीलाल की पत्थर की कलाकृति पूरे ढाई करोड़ रुपये में बिकी थी। यह खबर सुनकर रोशन पुर के कलाकारों में खलबली मच गई थी।बंशीलाल पत्थर की मूर्ति बनाने में माहिर तो था ही मिट्टी की मूर्तियाँ भी बहुत अच्छी बनाता था इसके अलावा वो काँसा पीतल एवं अष्ट धातु की मूर्तियाँ भी अच्छी बना लेता था यही कारण था कि वो रोशनपुर के कलाकारों में सबसे समृद्ध था वह एक महलनुमा मकान में रहता था उसे कई बड़े छोटे सम्मान प्राप्त हो चुके थे। जब बंशीलाल की कलाकृति ढाई करोढ़ रुपये में बिकी तो उसके प्रतिद्वंदी विद्याधर के कलेजे पर साँप लौट गया। उसे जलन के मारे चैन नहीं पड़ रहा था।
बंशीलाल और विद्याधर के बीच मनमुटाव तबसे चल रहा था जब बंशीलाल मजदूर की हैसियत से विद्याधर के पिताजी रामनिवास के साथ काम करता था रामनिवास उस वक्त रोशनपुर के सबसे अच्छे मूर्तिकार थे। विद्याधर को वे अपनी कला सिखा रहे थे उसी दौरान उन्हें सहायक की जरूरत पड़ी बंशीलाल तब भवन निर्माण के काम में मजदूरी किया करता था उसे तो मजदूरी से मतलब था इसलिए वो रामनिवास के साथ काम करने लगा विद्याधर उससे बुरा व्यवहार करता था। पर बंशीलाल अपमान सहकर भी काम पर ध्यान देता रामनिवास ने उसे कुछ भी नहीं सिखाया था फिर भी वो देखकर सीखता जा रहा था। एक दिन रामनिवास रात के दो बजे झोपड़पट्टी से गुजर रहे थे तो उन्हें एक झोपड़ी में से छैनी हथौड़े चलने की आवाज आई। जब उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो बंशीलाल ने दरवाजा खोला बंशीलाल रामनिवास को अपना गुरू मानता था। राम निवास बोले रात को दो बजे क्या कर रहे थे जब भीतर देखा तो दंग रह गए अंदर पत्थर की कई बनी अधबनी मूर्तियाँ दिखाई दीं रामनिवास ने पूछा ये तुमने बनाई हैं। अद्भुत वे समझ गए कि बंशीलाल के भीतर महान कलाकार छिपा हुआ है। दूसरे दिन जब बंशीलाल काम पर आया तो रामनिवास जी ने उसके सर पर हाथ फिराकर कहा बेटा आज से तुम मजदूर नहीं हो मैंने तुम्हें अपना शिष्य स्वीकार कर लिया है। अब विद्याधर और बंशीलाल दिनभर मूर्तिकला का अभ्यास करते शाम को रामनिवास दिन भर की मजूरी बंशीलाल को देते कहते बेटा परिवार के पालन के लिए पैसा जरूरी है रखो इसे अपने पास में। कुछ दिनों बाद ही रामनिवास का चहेता शिष्य बन गया बंशीलाल अब विद्याधर कोह खूब डाँट खाना पड़ता था। जिसका कारण वो बंशीलाल को मानता था एक दिन अचानक रामनिवास की तबियत खराब हो गई दो दिन में मूर्ति बाँके बिहारी की उन्हें बनाकर देना थी। अब कौन बनाए मूर्ति। रामनिवास जी ने अपने दोनों शिष्यों को मौका दिया। बंशीलाल की मूर्ति अनुपम बनी थी। जबकि विद्याधर अभी तक पत्थर को शेप भी नहीं दे सका था । बंशीलाल की मूर्ति पूरे पचपन हजार रुपये में बिकी थी। रामनिवास ने वे पूरे पैसे बंशीलाल को दे दिए कहा तेरा हक बनता है। रुपये ले जा और अपने घर को ठीक करा ले बारिश चा मौसम आने वाला है । इस घटना के बाद विद्याधर बंशीलाल के खुलकर सामने आ गया था। अब वो बंशीलाल पर टोटे टोटके कराता काला जादू कराता दो बार प्राण घातक हमला कराया पर बंशीलाल का बाल भी बाँका नहीं कर सका था। रामनिवास अब बूढ़े हो चुके थे उन्होंने मूर्ति कला का सारा ज्ञान बंशीलाल को दे दिया था। उनके जीवन काल में ही बंशीलाल बड़ा मूर्तिकार बन गया था विदेशों में भी नाम चमक गया था।रामनिवास जी ने अपने जीवन की जब आखिरी साँस ली तब बंशीलाल वहीं था।
रामनिवास जी को शा॔त हुए दस वर्ष बीत गए थे।बंशीलाल और विद्याधर में अब भी मतभेद कायम था। विद्याधर ने मूर्तियाँ बनाना बंद कर दिया था अब वह प्लास्दर ऑफ पेरिस की मूर्तियाँ साँचे में ढाल कर बना कर तथा उन्हें बेचकर अपनी गुजर कर रहा था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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