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कहानी: गाय

संजना और दौलतराम दस साल पहले हाइवे  के किनारे शहर से दूर छोटी सी चाय की दुकान चलाते थे उसी के पास उन्होंने एक झुग्गी बना रखी थी जिसमें वह रहा करते थे।आज  गोपाल गौशाला   डेयरी के भालिक थे सत्तर जर्सी गाएँ उनके पास थीं और बारह एकड़ सिंचित कृषि भूमि। अब वे संपन्न और खुशहाल जीवन जी रहे थे। यह सब  एक  गाय के कारण हुआ था जो  उन्हें दस साल पहले मिली थी।
दस वर्ष पहले दिसंबर माह में तेज ठंड में  जब मावठा पड़ा था तब एक गाय उन्हें अपने घर के सामने बैठी मिली बगल में उसकी नवजात बछिया भी थी। संजना के मन में उसके प्रति दया का भाव उत्पन्न हुआ उसके लिए गुड़ अदरक डाल कर दलिया तैयार कर खिलाया उसे ठंड से बचाने का इंतजाम भी किया। और गाय के मालिक के आने का इंतज़ार करने लगे पर मालिक नहीं आया पूरे आठ दिन बीत गए। संजना और दौलतराम गाय की अच्छी देखभाल कर रहे थे चारा भूसा दाना खली चुनी सबकी व्यवस्था कर ली थी उन्होंने गाय भी उनसे हिल मिल गई थी। गाय लावारिस थी इसलिए कोई उसे लेने नहीं आया था  अच्छी देखभाल और खिलाई से गाय एक बार में ढाई लीटर दूध दे रही थी।  दोनों वक्त के पाँच लीटर दूध का उपयोग वे चाय की दुकान में कर रहे थे। इससे उन्हें साढ़े तीन सौ रुपये की बचत हो रही थी। ढाई साल बाद वो बछिया भी गाय बनकर गर्भवती हो गई थी । जब वो पौने तीन साल की तब वो भी जन गई उसने भी जर्सी बछिया को जन्म दिया था। वो दोनों समय पन्द्रह लीटर दूध दे रही थी पाँच लीटर दूध उसकी माँ दे रही थी तीसरी बार भी उसने बछिया को जन्म दिया था।  अब वे गाय का शुद्ध दूध बेचने लगे थे गोपाल डेरी के नाम से उन्होंने दुकान खोल ली थी यह एक संयोग ही था कि उनके यहाँ बछड़े का कभी जन्म नहीं हुआ इन दस सालों में उनके यहाँ सत्तर गाएँ दूध दे रहीं थी। जिसे वे  पाश्चुरीकृत कर थैली में भर कर शहर में बेच रहे थे अब उन्हें लाखों रुपये महीने की आमदानी हो रही थी बारह एकड़ जमीन उन्होने दो साल पहले ही खरीदी थी जिसमें दो एकड़ जमीन पर गौशाला का निर्माण कर लिया था। जो गाय उन्हें सबसे पहले मिली थी वो अब भी ठीक ठाक थी।  उसकी उम्र सत्रह साल की हो चुकी थी दस साल में उसने छः बछियों को जन्म दिया था जिनसे संख्या बढ़ते बढ़ते सत्तर हो गई  थी । ग्यारह सौ लीटर दूध वे प्रतिदिन बेच रहें थे खेती से भी उनकी अच्छी आमदानी हो रही थी। इन दस सालों में संजना  बेटे रितिक तथा बेटी कृतिका की माँ बन गई थी। पहले वाली गाय अब अपने बुढापे के दिन आराम से काट रही थी।  संजना ने उसकी देखभाल में अब भो कोई कमी नहीं की थी।  आखिर वही तो उनकी खुशियों की जन्मदाता थी ये उसका ही परिवार था जो फलफूल रहा था अभी बारह बछिएँ ऐसी थी  जो तेजी से बढ़ी हो रही थीं।  जो उनकी समृद्धि बढाने का कारण बनने वालीं थीं। 
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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