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कहानी: गिलट की पायल

गिलट की पायल तथा अन्य आर्टीफिशयल जेवर हाट  बाजार में जाकर बेचने वाले दीपक सोनी का बावन वर्ष की उम्र में पीलिया बिगड़पे से दुखद निधन हो गया था घोर गरीबी में जीवन यापन कर रहे दीपक सोनी की अंतिम यात्रा में गिने चुने लोग  ही आए थे  दीपक की पत्नी रोशनी का दो साल पहले सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था दीपक की चार बेटियाँ थी जिनमें दो की शादियाँ तो रोशनी के जीते जी ही हो गईं थी दो बेटी अंजू और मंजू कुँवारी थीं उनकी जिम्मेदारी उनकी मौसी रश्मि ने उठा ली थी।
दीपक ने अपनी बावन वर्ष की उम्र में कभी सुख नहीं देखे  थे दीपक जब चार साल का था तब उसकी माँ शीला का निधन हो गया था दीपक के पिता सुरेश ने सुनीता से दूसरी शादी कर ली थी जिसका एक लड़का शरद हुआ तथा लड़की रूपा हुई। सौतैली माँ ने दीपक को बहुत दुख दिए थे। पिताजी रमेश की सराफा  बाजार में  किराये की दुकान थी जहाँ वे जेवर  को सुधारते थे तथा नकली चाँदी के जेवर बेचते थे। दीपक तीसरी तक पढ़ा था इसके बाद वो भी दुकान में बैठकर पिता के काम में हाथ बँटाता दीपक का सौतैला भाई  आठवीं तक पढ़ा था। इसके बाद वो भी दुकान पर बैठने लगा था। दुकान से आमदानी ज्यादा नहीं थी  इसलिए उनका खर्च मुश्किल से चलता था। रमेश के एक परिचित शिक्षा विभाग में बड़े बाबू थे उन्होंने कहा चपरासी की जगह खाली है आप अपने बड़े बेटे दीपक  को  कहो कि वो हमारे साहब वर्मा जी से मिल ले। दीपक गया भी लेकिन मायूस होकर आ गया क्योंकि वो तीसरी तक पढ़ा था अगर पाँचवी पास भी होता तो उसे वो नौकरी मिल जाती। उसका लाभ शरद को मिला शरद को चपरासी की नौकरी मिल गई थी।  शरद की सरकारी नौकरी लगने पर शरद की शादी शीतल के साथ हो गई दीपक सात साल बड़ा होकर भी कुँवारा था। शरद की शादी के बाद उसकी सौतैली माँ और बहन ने ऐसी चाल चली की दीपक को दुकान से बेदखल होना पड़ा अब दीपक फुटपाथ पर दुकान लगा रहा था  दीपक की सौतैली माँ दुकान कान पर बैठने लगी थी।  दीपक हफ्ते में चार दिन हाट बाजार करता था तथा तीन दिन शहर में ही रहकर फुटपाथ पर  दुकान लगाता था  दीपक के पिता रमेश ने दीपक की शादी  विधवा शरबती की लड़की रोशनी से कर दी थी। दीपक को दो कमरे देकर अलग कर दिया था।दीपक को चार बेटियाँ हुई उनको पढ़ाने लिखाने में दीपक ने बड़ी  मुश्किल से   पैसा कमाकर खर्च किया। दीपक के पिता का निधन  हो गया था  दीपक ने लोन लेकर  चैन बनाने की मशीन लगवा ली थी वो भी नहीं चली उसमें उसे बहुत घाटा हुआ  आखिर में   रोशनी ने   कपड़ा सीकर अपने और अपने बच्चों का पेट पाला जिस दिन रोशनी  के साथ हादस हुआ उस दिन सारी रात  जगकर   रोशनी ने कपड़े सिए थे।  सुब्ह वो सिले कपड़े दुकान पर देने जा रही थी।  तभी उसके सामने कार आ गई उसने  रोशनी को कुचल दिया था।  वो दो बच्ची जो कँवारी   थीं दोपक के हवाले कर गई थी।  दीपक उन बेटियों के साथ ही रह रहा था समय पर खाना पीना  नहीं मिलने के कारण उसके लीवर में इन्फेक्शन  हो गया था
जो उसकी जान लेकर माना  । उसकी मौत के साथ  ही उसे हमेशा के  लिए दुखों  से  छुटकारा मिल गया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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