सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

लघुकथा- दुश्मन से मुहब्बत

सोमेशराजेश और प्रखसोमेशर के बीच विगत बीस वर्षों से दुश्मनी चली आ रही थी दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने के एक भी अवसर को नहीं गँवाते थे। कोई दुखी परेशान होता तो दूसरे को खूब मज़ा आता उसी राजेश के कारण प्रखर तथा उसके बेटे कुलदीप की जान बची थी और मुजरिमों को जेल हुई थी। जिनको बत्तीस साल की जेल हुई थी वो प्रखर की पत्नी प्राची तथा दोस्त सोमेश था।
यह घटना दस वर्ष पुरानी है। जब सोमेश प्रखर का गहरा दोस्त हुआ करता था उसका घर में आनाजाना था प्राची से उसकी खूब बनती थी। राजेश की तब भी प्रखर से दुश्मनी थी। दोनों एक दूसरे की खबर लेते रहते थे। प्राची और सोमेस कि निकटता खतरनाक मोड़ पर पहुँच गई थी जिससे प्रखर अनजान था वो अपनी पत्नी को वफ़ादार समझता था और सोमेश को सच्चा दोस्त। जब राजेश को सोमेश तथा प्राची के षडयंत्र का पता चला तो उसने विचार किया की जब दुश्मन ही जिंदा नहीं रहेगा तो वो किसे नीचा दिखाएगा किसकी बुराई कर खुश होगा।यह सोचकर उसने प्रखर को खतरे से आगाह करने की कोशिश की। और उसमें वो सफल भी हुआ। सोमेश और प्राची ने कुलदीप की बेरहमी से हत्या करने के बाद प्रखर को भी जान से मारने की साजिश रच रखी थी। लेकिन सारी दुश्मनी भुलाकर राजेश ने प्रखर को यह बात बता दी। सुनकर अंसे पहले तो यकीन नहीं हुआ लेकिन जब उसने पत्नी की चोरी से घर के कुछ स्थानों पर सी सी टी वी कैमरे लगाए तो उसके पाँव तले की जमीन खिसक गई उसके जाने पर वे कुलदीप की बेरहमी से पिटाई करते थे एक दिन जब उन्होंने कुलदीप की गर्दन दबाकर जान से मारने का प्रयास किया और उसे मरा समझकर वो बोरे में बंद कर सुनसान जगह पर फेंक आए।
प्रखर का कैमरा भोबाइल से अटेच था वो फौरन उस सुनसान स्थान पर पहुँचा ।बोरा खोला और देखा तो पाया कि कुलदीप मरा नहीं था उसकी साँसें चल रही थी प्रखर ने घटना से पुलिस को अबगत करा दिया था पुलिस ने अपनी रण नीति गोपनीय रखी थी। जिस दिन वे प्रखर की हत्या करने वाले थे उस दिन पुलिस ने प्रखर को घर में रहने की हिदायत दी थी। वो घर में छिपा था बेड़ पर सामान इस तरह बिखरा कर चादर से ऐसे ढक दिया जैसे कोई सो रहा हो रात में जब सोमेश और प्राची ने बिस्तर पर प्रखर को सोता समझ छुरी से वार किए तब पुलिस सामने आ गई और दोनों को गिरफ्तार कर लिया। ठोस सबूत होने के कारण दोनो को माननीय न्यायाधीश जी ने बत्तीस साल की सजा सुनाई थी।तबसे सोमेश और प्राची जेल मे सजा काट रहे थे कुलदीप अब अठारह वर्ष का हो गया था और बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा था।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...