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कहानी: सिर चढ़ी अफसरी

सेन्ट्रल जेल के कैदी नंबर चार सौ तीन चंदर सिंह को शायद ही किसी ने हँसते हुए या किसी से बात करते हुए देखा हो। वो ज्यादातर समय गुमसुम रहते थे कोई बात करने की कोशिश भी करता तो जवाब भी नहीं देते कभी प्रदेश के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी रहे चंदर सिंह अपराध सिद्ध होने पर जेल की सजा भुगत रहे थे। अभी भी वे अपने आपको अफसर ही मानते थे और किसी को अपने लेबल का नहीं समझते थे सभी को हेय नजरों से देखते थे इस जेल में आए हुए उन्हें तीन वर्ष हो गए थे उनकी आयू तिरेपन वर्ष की हो गई थी अलग अलग मामलों में उन्हें कुल पैंसठ वर्ष को सजा हुई थी और अभी कुछ केस ऐसे उन पर चल रहे थे जिनका फैसला होना बाकी था। वे अच्छी तरह समझ गए थे कि उनकी  बाकी जिंदगी जेल में ही कटना है।
चंदर सिंह प्रशासनिक अधिकारी होने से पहले एक बिल्डर के यहाँ साइट सुपर वाइजर थे बहुत कम तनख्वाह थी और साधारण जीवन जी रहे थे। उनकी पत्नी रोशनी  भी निर्माण श्रमिक थी पिताजी प्रहलाद जी रिक्शा चलाते थे। चंदर सिंह को अफसर बनने की प्रेरणा रोशनी ने दी थी। उसी ने उनकी सुपरवाइजर की नौकरी छुड़वाई थी शहर में अलग कमरा दिलवाया था। तथा उनका पूरे चार साल तक सारा खर्च उठाया था पिताजी रिक्शा चलाते और रोशनी दो दो शिफ्टों में काम करती चंदर का भाई  गोकुल   बारहवीं से आगे इसलिए नहीं पढ़ सका था क्योंकि सारा रुपया चंदर सिंह पर खर्च हो रहा था। चार साल बाद मेहनत रंग लाई चंदरसिंह का चयन हो गया था घर में दिवाली जैसी खुशियाँ मनाई जा रही थीं चंदर के तो तेवर ही बदल गए थे। चंदर सिंह जब ट्रेनिंग कर के आए  तो बदले हुए थे। घर आना उन्होंने उचित नहीं समझा अपनी पत्नी रोशनी तथा छः साल के बच्चे रोहित से मिलना भी उन्हें ठीक नहीं लगा क्योंकि वे अब सबसे बड़े अफसर थे। रेस्टहाउस में रहे और जब बंगला मिला तो उसमें चले गए अब रोशनी उन्हें फूहड़ लग रही थी तथा रोहित गरीब तबके का लड़का। कुछ दिन बाद पता चला कि चंदर ने शादी कर ली है पत्नी मंजू मंत्रालय में सेक्रेटरी है। चंदर के पिता प्रहलाद जी ने सोचा था कि चंदर अफसर बन गया है तो अब उन्हें रिक्शा नहीं चलाना पड़ेगा। भाई गोकुल सोच रहा था अब वो अधूरी पढ़ाई पूरी कर सकेगा। रोशनी सोच रही थी अब उसे मजदूरी से छुटकारा मिल जाएगा रोहित का अच्छे स्कूल में एडमीशन हो जाएगा पर ऐसा कुछ नहीं हुआ मंजू से जब चंदर ने शादी की तो किसी को नहीं बुलाया। वे सब अपने अपने काम में रम गए चँदर अपने से छोटे लोगों से कभी सीधे मुँह बात तक नहीं करते थे। 
जिला स्तर पर पटवारी की भर्ती होना थी चंदर के भाई गोकुल ने विचार किया कि वो अपने भैया से मिले शायद वे नौकरी दिलवाने में मदद करें पर चंदर सिंह ने गोकुल की तरफ देखा तक नहीं। आखिर गोकुल ने ही कहा भाईसाहब पटवारी का फार्म भरा है। आप अगर कुछ सहायता कर सकें तो सुनकर चंदर सिंह ने  साफ मना कर दिया। कहा मैं कुछ नहीं कर सकता जो करना है अपनी दम पर करो मुझसे किसी प्रकार की उम्मीद मत रखो। सुनकर गोकुल निराश हो गया था । उसके सपने टूट गए थे। वहाँ से आने के बाद  गोकुल फिर कभी  चँदर के पास नहीं गया। बाद में पता चला कि चंदर ने जिन तीन लोगों का चयन किया उनसे पन्द्रह  लाख रुपये  प्रति व्यक्ति लिए थे। गोकुल ने सरकारी नौकरी की आस छोड़ दी थी। और ठेकेदारी  करने लगा था । चंदर की बीस साल की नौकरी हो गई थी भ्रष्ट नेताओं से मिलकर खूब पैसे कमाए ढाई एकड़ जमीन में शानदार कोठी बनवाई तथा उसमें सुखपूर्वक रहने लगे।  समय सबका एक सा नहीं रहता  चंदर की किस्मत ने भी धोखा देना शुरू कर दिया था।  प्रदेश में चुनाव के बाद सरकार बदल गई थी।  नए मुख्यमंत्री साफ सुथरे ईमानदार छवि वाले इंसान थे। उन्हे॔ मालूम था कि कैसे प्रदेश को लूटा गया था । चंदर के यहाँ जब छापा पड़ा तो दो ट्रक नगद धन राशि तहखाने से मिली। चंदर की कोठी तोड़ दी गई थी ।
चंदर सहित दर्जन अफसर नेता जेल भेज दिए गए थे।इसके बाद चंदर सिंह कभी जेल से वापिस नहीं आ सके।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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