रतनपुर माध्यमिक शाला की प्रधानाध्यापक शान्ति उइके आज सेवानिवृत हो गई थीं उनका भावभीना विदाई समारोह आयोजित हुआ था खुली जीप में बिठाकर उनको नगर में घुमाया गया था उन्हें लेने उनका पूरा परिवार आया था उनका एक लडका विश्वास मजिस्ट्रेट तथा दूसरा आशुतोष डॉक्टर था एक बहू लता प्रोफेसर एवं दूसरी बहू रश्मि डॉक्टर थी पति शिवलाल दो साल पहले पोस्ट मास्टर के पद से रिटायर हो गए थे तथा उनके,दोनों पोते एवं पोतियाँ भी आए थे। इसके बाद उन्होंने अपने एच आई जी डूप्लेक्स में स्नेह भोज का आयोजन किया था । उसमें शहर के सभी प्रमुख लोग शामिल हुए थे जिनमें वयोवृद्ध वकील शीतल प्रशाद एवं उनकी पत्नी सेवानिवृत प्राचार्य सरला भी थी जिनकी बदौलत वे आज इस मुकाम पर पहुँची थी शाँति उइके कभी शीतल जी के यहाँ घरेलू नौकरानी थीं।
शीतल जी और सरला जी बहुत खुश थे शाँति जी ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया था तथा सभी से कहा था कि ये मेरे आदर्श हैं।
आयोजन के समाप्त होने के बाद जब शाँति जी अपने कक्ष में आई तो उनके दिमाग में पुरानी यादें चल रही थीं शाँति जी के पिता घीसी दा छियालीस साल पहले इस शहर में काम की तलाश में आए थे तब शाँति जी की उम्र सोलह वर्ष की थी। वे एक झुग्गी में किराये से रहे थे । घीसी दा मजदूरी करने चले जाते घर में शाँति उनकी माँ सुखिया दादाजी भीखा तथा दादी राजो रह जाते थे छोटा भाई राजेन्द्र सातवीं में सरकारी स्कूल में पढ़ने जाता था। कभी कभी राजो भी घीसी दा के साथ मजदूरी करने चली जाती थीं। शाँति जी जब अठारह वर्ष की हुईं तब शीतल जी के यहाँ नौकरानी का काम करने लगीं।शीतल जी वकील थे और उनकी पत्नी सरला हायर सेकेण्डरी स्कूल में होम साइंस की व्याख्याता थीं। शाँति जी कभी स्कूल तो नहीं गई थीं पर छोटे भाई राजेन्द्र की किताबों से उन्हें अक्षर ज्ञान होगया था गिनती उन्हें याद थी इससे अधिक वे कुछ नहीं जानती थी वो चवालीस साल पुराना समय था। सरला शाँति को हर रविवार को दो घण्टे दोपहर में बिठाकर पढ़ाती थी दो साल में उन्होंने शाँति जी को अच्छे से पढ़ना लिखना सिखा दिया था दिसंबर का महीना था हायर सेकेण्डरी परीक्षा के फार्म भराए जा रहे थे सरला जी ने शीतल जी से शपथपत्र तैयार कराकर शाँति का होम साइंस से स्वाध्यायी छात्र के रूप में फार्म भरवा दिया। सरला जी ने शाँति को अच्छे से पढ़ाया। जिससे शाँति जी ने प्रथम श्रेणी में हायर सेकेण्डरी परीक्षा पास कटर ली शाँति जी की उम्र साढ़े इक्कीस साल की हो गई थी। जब अखबार में सहायक शिक्षक की भर्ती निकली तो सरला ने शाँति जी का फार्म भरवा दिया। शाँति जी ने चयन परीक्षा पास कर ली थी उनका चयन सहायक शिक्षक पद पर हो गया था।शिवलाल पोस्ट ऑफिस में उस समय क्लर्क थे। उन्होंने अपने पिता सूरज सिंह से शाँति से शादी कराने की बात कही सूरज सिंह शाँति जी के पिता से मिले इस रिश्ते पर दोनों पक्ष सहर्ष तैयार हो गए और इस तरह शाँति जी की शादी शिवलाल जी से हो गई। जब दो कमाई होने लगीं तब उन्होंने शहर की अच्छी कॉलोनी में मकान ले लिया था इन चालीस सालों में शाँति देवी निम्न वर्ग से उच्च मध्यम वर्ग में शामिल हो गई थीं। वे शीतल जी और सरला जी की हमेशा आभारी रहीं आज वे किसी से जब भी कहती हैं कि वे घरेलू नौकरानी थीं तो किसी को उनकी बात पर आज भी विश्वास नहीं होता है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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