हरिराम का खेत में बने कुएँ में गिरकर डूबने से दुखद निधन हो गया था उसके निधन को लेकर गाँव में कई तरह की चर्चाएँ चल रही थीं कुछ इसे हादसा बता रहे थे और कुछ इसे आत्महत्या का मामला बता रहे थे पुलिस ने तो इसे हादसा मानकर फाइल बंद कर दी थी।हरिराम कभी पचास एकड़ जमीन का मालिक था जो अंत में ढाई एकड़ जभीन का मालिक रह गया था उसके ऊपर दुनिया भर का कर्ज था अगर वो चुछ दिन और जीवित रहता तो यह ढाई एकड़ जमीन भी जल्दी ही बिक जाती।
बीस वर्ष पूर्व जब हरिराम के पिता उत्तम च॔द्र जीवित थे तब वे गाँव के सबसे संपन्न और खुशहाल किसान थे घर में और खेतों में नौकर चाकर काम करते थे। हरिराम शुरू से ही कोई काम नहीं करता था दोनो हाथों से पैसा लुटाना उसका शौक था। पिता के मरने के बाद सारा कारोबार उसके हाथ में आ गया था हरिराम के चार बेटियाँ थी बेटा उसको था नहीं उसकी सोच थी कि बेटियों की तो शादी हो जाएगी उसके बाद ये खेती कौन सँभालेगा। उसने अपनी आदतों में सुधार नहीं किया था पिता के मरने के बाद वो निरंकुश हो गया था। धीरे धीरे जमीन बिकने की नौबत आ गई हरिराम को जमीन बेचकर एक मुश्त रुपया पाने का चश्का लग गया था जिसका नतीजा यह हुआ कि उसकी सारी जमीन बिकती चली गई फिर भी उसके खर्चों में कमी नहीं आई। खराब आदतों के कारण वो ह्रदय रोगी हो गया उसके इलाज में भी उसका बहुत सा रुपया खर्च हो गया था। फिर उसकी बड़ी बेटी कृष्णा की शादी आ गई उसकी शादी में हरिराम के सर पर भारी खर्च चढ़ गया। जिसकी भरपाई करने के लिए अमानत में खयानत करते हुए उसने वो दस एकड़ जमीन भी किसी को पाँच साल के मुनाफे से देकर पाँच लाख रुपये ले लिए जो उसकी थी नहीं राजमल वो जमीन हरिराम की देखरेख में छोड़कर सूरत में नौकरी कर रहा था। पिछले पाँच साल मे उसने राजमल की जमीन से भरपूर फसल का लाभ लिया लेकिन बदले में राजमल को एक रुपया भी नहीं दिया राजमल की आठ लाख रुपये की उधारी हरिराम के सिर पर चढ़ी हुई थी ऊपर से पाँच लाख रुपये में पाँच साल के लिए उसने वो खेत किसी दूसरे को दे दिया था। तकाजा करने वालों का उसके घर ताँता लगा रहता था दिन भर उसके मोबाइल की रिंग बजती रहती पर कभी वो फोन नहीं उठाता था उसे मालूम था कि जो उसे फोन कर रहे हैं सबसे उसने कर्ज ले रखा है। जिस रात हरिराम के साथ यह हादसा हुआ उस दिन वो दिनभर विचलित रहा था। हार्ट की बीमारी की दवा के लिए भी उसे हर माह रुपये जुटाने पड़ते थे।कुल मिलाकर उसके ऊपर लगभग पचास लाख का कर्ज था पहले तो औसे आत्महत्या करने का ख्याल आया पर उसके मन ने इसे स्वीकार नहीं किया लेकिन कर्ज की रकम जोड़ने पर उसको चक्कर आ गए थे पाँच लाख रुपये महीना तो उसका ब्याज बढ़ रहा था जबकि कमाई न के बराबर थी। उसे प्यास लगी उस वक्त रात के साढ़े ग्यारह बजे थे वो अपने खेत पर बनी टपरी में अकेला था अचानक उसे प्यास लगी तो वो कुएँ के पास अकेला ही आया था। पानी निकालते समय उसे जोर का चक्कर आया। जिसके कारण उसका संतुवन गड़बब़ाया और वो कुएँ में गिर गया तथा अचेत हो गया ऐसी अवस्था में ही उसका निधन हो गया था। उसके मरने से सबका कर्ज डूब गया था। हरिराम की मौत ने उसे तकाजे से मुक्त कर दिया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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