सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: खुद की दम पर

प्रदेश के सबसे ईमानदार आइ ए एस अधिकारी रहे बलवीर वर्मा सेवानिवृति के आम आदमी की तरह जीवन यापन कर रहे थे उनकी बातों तथा व्यवहार से कोई अंदाजा नही लगा सकता कि वे कभी प्रदेश के मुख्य सचिव रह चुके हैं।
बचपने में जब बलवीर वर्मा स्कूल जाते तो कभी किसी की नकल नहीं करते परीक्षा में कुछ टीचर सब बच्चों को नकल कराते पर वर्मा जी अपना पेपर अकेले ही हल करते रहते। पाँचवी की बोर्ड परीक्षा में खुलकर नकल चली पर वर्मा जी ने एक शब्द की भी नकल नहीं की भले ही वे कक्षा में प्रथम न आए हों पर जितने नंबर मिले वे उनके अपने इस बात का उन्हें संतोष रहा। हर परीक्षा उन्होंने अपने दम पर पास की वे जब हायर सेकेण्डरी में आए तब पता चला कि ज्यादातर टीचर टूयूशनखोर हैं और इसी हिसाब से नंबर देते हैं। और तो और पैसे लेने पर वे लोकल परीक्षा की कॉपी तक बदल देते थे। नवीं की परीक्षा में नगरपालिका अध्यक्ष का लड़का विजयेन्द्र  भी शामिल हुआ था विजयेन्द्र के पिता ने कक्षा टीचर को बुलाकर कहा कुछ भी करो कैसे भी करो  मेरा लड़का प्रथम आना चाहिए और रुपये से भरा लिफाफा सर को दे दिया वो खुश हो गए। दूसरे दिन वे वर्मा जी की हल की हुई हर विषय की कॉपी लेकर आए और विजेयन्द्र से कहा ये ऐसी की ऐसी उतार लो । जब रिजल्ट आया तो विजयेन्द्र कक्षा में टॉप पर आया था  वर्मा जी को सिर्फ प्रथम श्रेणी मिली थी। यही उनके साथ बोर्ड परीक्षा में हुआ  प्रेक्टीकल परीक्षा में सबसे अच्छी फाइल तैयार करने सबसे अच्छा प्रेक्टीकल करने सबसे अच्छा मौखिक टेस्ट देने के बाद भी उन्हें बहुत कम नंबर मिले  क्योंकि उन्होंने एक्जामिनर को देने के लिए जो रुपये इकठ्ठा किए गए थे उसमें एक रुपया भी नहीं दिया था जिसके कारण उन्हें इतने कम नंबर मिले की  वे प्रदेश की टॉप टेन मेरिट सूची में आने से  महज दो अंक से पिछड़ गए थे। यह देखकर प्राचार्य डी के यादव को बड़ा दुख हुआ उन्होंने तीनों सर को बुलाया तथा कहा यह सब क्या है आपने बलवीर वर्मा को पच्चीस में से दस नंबर दिए और परीक्षा में वो पिचहत्तर में तिहत्तर नंबर लाया। और जिस आवारा लड़के राकेश को तुमने पच्चीस में से चौबीस नंब दिए वो तो परीक्षा में पिचहत्तर में से दस नंबर भी नहीं ला सका वो पच्चीस में से चौबीस नंबर लेकर भी पास नहीं हुआ और बलवीर ने दस नंबर मिलने के बाद भी जिले में टॉप किया। इसका संज्ञान माननीय  लोक  शिक्षण कमिश्नर ने लिया है और मेरी तथा आप तीनों की वेतनवृद्धि रोकने के आदेश दिए हैं प्रेक्टीकल परीक्षा का सारा रिकार्ड मंगा लिया है एक्सटर्नल को सस्पेण्ड कर दिया गया है और आप तीनों के खिलाफ और भी कड़ा एक्शन लिया जा सकता है। यह सुनकर तीनों सर काँपने लगे इस की चर्चा जिले भर में फैल गई थी तीनों सर के तबादले करा दिए गए थे प्राचार्य जी ने कहा बेटे मैं बहुत शर्मिंदा हूँ मुझे  माफ करना पर मेरी दुआएँ हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगी उन्होंने बलवीर को अपना सबसे मँहगा पेन दिया। तीनों सरों के मुँह लटक रहे थे।  वर्मा जी ने बी एस सी में टॉप किया और आइ ए एस की परीक्षा में शामिल हो गए । उन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर तीसरा  स्थान प्राप्त किया था। महज साढ़े बाइस साल की उम्र में  यह बड़ी बात थी उनके शहर के लिए ये गर्व का  विषय था। ट्रेनिंग के बाद  जब वर्मा जी ने पदभार सँभाला  तो कुछ ही दिनों  में वे  अपनी  ईमादारी  एवं निष्ठा से छा गए थे। वर्मा जी वेतन में ही खुश रहने वाले इंसान थे। उनका  हर जगह सम्मान था  वे रिटायरमेन्ट  के पहले प्रदेश के मुख्य सचिव  के पद पर भी रहे। तब भी वे  सादगी के साथ जीवन यापन कर रहे थे।
*******
रचनाकार
प्रदीप कश्यप


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...