सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: बेदखल

अपनी जमीन जायदाद से बेदखल करने वाला बेटा नेकचंद्र आज बुढ़ापे में रमेशचंद्र  एवं उनकी पत्नी माधवी का सहारा बना था। कभी जिसे वे निकम्मा नकारा कहकर तिरस्कृत करते थे आज उसके कारण उनका नाम रोशन हो रहा था।रमेशचंद्र कभी कभी अपने किए पर बहुत दुखी होते थे।
पैंतालीस वर्ष पूर्व जब नेकचंद्र जी का जन्म हुआ था तब उन्हे बड़ी ख़ुशी हुई थी शादी के पन्द्रह साल बाद बेटे का जन्म जो हुआ था। उसके तीन साल बाद जब छोटे बेटे नवीन चंद्र का जन्म हुआ तब  उनका स्नेह छोटे बेटे पर कुछ अधिक हो गया नेकचंद्र स्वभाव से नेक सीधे सरल  थे। बचपन में उनकी सरलता और सीधापन रभेश चंद्र  और माधवी को अच्छा नहीं लगता था नवीन चंद्र उनके बिल्कुल विपरीत था चंचल चपल और बातूनी वो कुछ मतलबी भी था। बचपन में वो अपनी वस्तुएँ किसी को छूने तक नहीं देता था और नेकचंद्र जी की चीजें हडप लेता । माँ बाप हर बार नवीन का पक्ष लेते कई बार वो जो गलती करता उसका इल्जाम नेकचंद्र पर मढ़ देता धीरे धीरे दोनों बड़े हो रहे थे  नेकचंद्र जी माता पिता से पिट पिटकर और नवीन चंद्र माता पिता का लाड़ दुलार पाकर। नेकचँद्र पढ़लिखकर बढ़े हुए तो समाजसेवा के कार्यों में समय बिताने लगे। कई बार वे कई दिनों तक घर पर नहीं आते जिससे पिता उन पर क्रोधित हो जाते पर नेकचंद्र कभी पिता से बहस नहीं करते। नवीन वो सब कार्य करता जिससे पिता खुश होते वो पिता जी की दुकान पर बैठने लगा था जब दुकान पर बैठता तब पिता और ग्राहक दोनों को ठग लेता कभी नेकचंद्र दुकान पर बैठते तो जरूरत मंद को उधार सामान कम कीमत में दे देते एक बार जब रमेश चँद्र ने शाम को दुकान का हिसाब मिलाया तो उसमें पाँच हजार रुपये कम पाए जब उन्होंने नेकच॔द्र से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया सरला बुआ का बेटा बीमार था उन्हें पैसे की सख्त जरूरत थी तो मैंने उन्हें वे रुपये उधार दे दिए वे खूब आशीर्वाद देकर गईं। यह बात सुनकर रमेशचंद्र आग बबूला हो गए सरला उनकी सगी बहन थी जो बीभार था वो उनका भानजा था। फिर भी वे बोले धँधे में कोई  किसी का रिश्तेदार नहीं होता तूने वो रुपये उधार नहीं दिए बल्कि लुटाए हैं मै सरला को अच्छी तरह जानता हूँ अब वे पैसे कभी नहीं लौटाएगी तेरी जगह  मैं या नवीन होता और वो अपने मरे बेटे के कफन के लिए भी पैसे माँगती तो भी नहीं देता इतनी नफरत करता बूँ मैं उससे और आज से तू मेरी नजरों से गिर गया आज के बाद दुकान पर तू कभी नहीं बैठेगा । नेकचंद्र ने पिता से बहस नहीं  की और भलाई के काम में लगे रहे सात दिन बाद घर आए तो पिता ने पूछा कहाँ थे तो बताया कि सरला बुआ के यहाँ था  उनके बच्चे के इलाज कराने में सहयोग कर रहा था इलाज में पैथीस हजार खर्च हुए  पर बच्चा ठीक हो गया। रमेशचंद्र  अपना गुस्सा जब्त कर बोले पैसे की व्यवस्था कैसे हुई  तो नेकचंद्र जी ने कहा रोहन चाचा से उधार लिए । रमेश बोला अब इन्हें अदा कौन करेगा। नेकचंद्र मैं तुझसे तँग आ गया हूँ और तुझे अभी इसी वक्त घर से निकाल रहा हूँ अब मुझसे तेरा कोई वास्ता नहीं। मेरी संपत्ति से भी तुझे बेदखल कर रहा हूँ जा निकल जा मेरे घर से नेकचंद्र जी ने माँ  माधवी की तरफ देखा वे भावहीन चुप थीं। नेकचँद्र बोले मैंने कल शाम से कुछ नहीं खाया है मुझे जोर की भूख लगी है कम से कम खाना ही खिला दो। उनकी बात सुनकर रमेशचंद्र गरजते हुए बोले  अभी दूर हो जा मेरी नजरों से कोई खाना बाना नहीं मिलेगा।  नेकचंद्र जी चुपचाप वहाँ से चल दिए तो देखा कि   थोड़ी दूर पर लखन काका खड़े उनका इंतजार कर रहे हैं। वे नेकचंद्र जी से बोले मै इधर से जा रहा था तो मैंने सुना तेरे पिता कह रहे हैं कोई काना नहीं मिलेगा मैंने यह भी सुन लिया था कि तूने शाम से कुछ नहीं खाया है। इसलिए  मैं यहाँ रुक गया चल घर चल तेरी काकी खाना बना रही है अभी मैंने भी कुछ नहीं खाया है साथ ही भोजन करेंगे नेकचंद्र जी लखन काका के साथ चल दिए। लखन काका का नेकचँद्र जी ने कई बार मुसीबत में साथ दिया था।  इसके बाद नेकचँदर जी ने पूरी तरह अपने आपको भलाई के कार्यों में समर्पित कर दिया अपने खाने पीने की सुध भी न रखी पर लोगों ने कभी उन्हें भूखे नहीं रहने दिया।  उन्होंने  रामनगर में ही एक कुटी बना ली थी जिसमें वे रहने लगे थे। जब रामनगर भें नगर पालिका का गठन हुआ तो नेकचंद्र  पहले उसके अध्यक्ष चुने गए अपने कार्यकाल में उन्होंने रामनगर  का टहुँऑर विकास किया उनकी उजली छवि को देखकर पार्टी ने उन्हें विधान सभा चुनाव में टिकट दे दिया वे भारी बहुमत से जीते।  अब उन्हें शासन द्वारा शासकीय आवास मिल गया था  वे कुटी से  उस आवास में आ गए कुटी उन्होंने बेघर भीखू को दे दी थी। उधर रमेश चंद्र  जी ने नवीन की शादी कर दी शादी में सबको बुलाया पर नेकचंद्र को इससे दूर रखा  नवीन की शादी विमला से हुई विमला  भी नवीन की तरह मतलबी तथा अवसरवादी थी। वे दोनों माँ बाप को नेकच॔द्र के खिलाफ भड़काते कहतै वो बड़ा नेता है वो  आपकी संपत्ति हड़प लेगा और हम सड़क पर आ जाएँगे आप जब नहीं रहोगे तो हमें वो बर्बाद कर देगा। रमेशचँद्र और माधवी उनकी चिकनी चिपड़ी बातों में आ गए मकान जमीन दुकान जायदाद सब नवीन और विमला के नाम कर दिए सारे जेवर भी  माधवी ने विमला को सौंप दिए थे।  कुछ दिनों तक तो सब ठीक चलता रहा  फिर वे अपने तेवर दिखाने लगे उन्होंने रमेश और माधवी को तंग करना शुरं कर दिया  उनके बच्चे भी दादा दादी को तँग करने लगे थे। इधर नेकचँद्र जी को केबिनेट मंत्री बना दिया गया था नेकचंद्र जी ने रामनगर में अन्नक्षेत्र खुलवाया था वे एक बार जब दौरे पर आए तो अन्नक्षेत्र में भी गए वहाँ दोपहर का भोजन बँट रहा था। बेसहारा जरूरतमंद लाचार बूढे तथा गरीब पर देशी भोजन प्राप्त कर रहे थे नेकचंद्र जी ने उनमें अपने माता पिता को देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ।  वे नेकचँद्र से अपना चेहरा छिपाने की कोशिश कर रहे थे पर नेकचँद्र जी उनके पास पहुँच गए । पता चला कि  नवीन और उसकी पत्नी ने उन्हें घर से निकाल दिया है वे नेकचंद्र जी ने जो रैनबसेरा बनवाया है उसमें रह रहे हैं अन्नक्षेत्र से दोनों समय का खाना मिल जाता है। नेकचंद्र जी को सुनकर बड़ा अफसोस  हुआ। उनसे कहा चलो आप मेरे साथ रहो इस पर वे बोले हम रामनगर छोड़कर कहीं नहीं जाएँगे तब  नेकचँद्र जी ने उन्हें रेन बसेरा तथा अन्न क्षेत्र का प्रबंधक बना दिया तथा एक सर्व सुविधा युक्त आवास उनको रहने के लिए दे दिया दो सेवक भी उन्हें दे दिए।  रमेश चँद्र बोले बेटा तूने नेकी कभी भी नहीं छोड़ी आज उसका प्रमाण भी देख लिया।  नेकचंद्र  राजधानी लौट गए थे । रोज वे अपने माता पिता की खबर लेते रहते थे दूसरी और घर से निकालने के बाद विमला और नवीन ने आज तक उनसे कोई संपर्क नहीं किया था।
****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...