कभी ससुराल साल भर अपमान जनक समय गुजार कर आए देवनारायण आज सुखपूर्वक रह रहे थे कृषि विभाग में ग्रामीण कृषि विस्ता अधिकारी के पद पर कार्य करते हुए उन्हें दस वर्ष होने जा रहे थे इस बीच वे एक बार भी अपनी ससुराल नहीं गए थे उनका मन अभी तक उचटा हुआ था वे अपना ससुराल में गुजारा एक साल अपमान भरा समय आज तक भुला नहीं सके थे।
देवनारायण जी ने बीस वर्ष पूर्व बारहवीं कृषि विषय से पास की थी। तथा सिया पुर नगर पालिका परिषद में दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी बन गए थे उस समय रघुवर प्रताप सिंह नगर पालिका अधिकारी थे। देवनारायण कर्मचारी नेता बन गए थे वेतन बढ़ाने की माँग को लेकर सफाई कर्मी लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे लेकिन सही नेतृत्व के अभाव में कोई लाभ नहीं हो रहा था।
लेकिन इस बार उनका नेतृत्व देवनारायण जी ने किया तथा आंदोलन छेड़ दिया। पूरे नगर की सफाई व्यवस्था ठप हो गई थी रघुवर प्रताप जी ने आँदोलन को खत्म करने की हर संभव कोशिशें की पर नाकाम रहे। आखिर हारकर उन्होंने देवनारायण को अकेले अपने पास बुलाया और डाँटते हुए बोले बहुत हो गया अब या तो हड़ताल खत्म कराओ या परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो। देवनारायण बोले मैं परिणाम भुगतने को तैयार हूं, लेकिन बिना माँग मंजूर किए हड़ताल खत्म नहीं करूँगा। उनकी बात सुनकर रघुवर प्रताप नरम होकर बोले मान भी जाओ मैं उनकी जायज माँगे पूरी करने को तैयार हूँ कल आँदोलन खत्म हो जाना चाहिए कल मेरी वार्ता कराओ और यह सब खत्म करो। देवनारायण बोले एकदम आंदोलन खत्म किया तो मेरा राजनैतिक जीवन खत्म हो जाएगा लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि तीन दिन में हड़ताल समाप्त हो जाएगी। रघुवर जी ने देवनारायण जी की बात मान ली तीन दिन में देवनारायण जी ने समझौता कराकर हड़ताल खत्म करा दी। इससे रघुवर जी देवनारायण जी से बड़े खुश हुए उन्होंने उन्हें पूरी छूट दे दी इधर देवनारायण जी एक प्रमुख दैनिक समाचार पत्र के संवाददाता बन गए। नगर पालिका से उन्हें तनख्वाह मिलती रही और वे रघुवर जी के पक्ष में कार्य करते रहे। जिससे आगामी विधानसभा चुनाव में उन्हें पार्टी से टिकट मिल गया। देवनारायण जी ने रघुवर जी के चुनाव प्रचार की कमान अपने हाथ में ले ली तथा दिनरात एक उनके पक्ष में प्रचार किया। रघुवर जी चालीस हजार मतों से चुनाव जीत गए थे। रघुवर जी के विधायक चुने जाने पर जो रोशनलाल गुप्ता अध्यक्ष बने वे देवनारायण जी के विरोधी थे रोशनलाल ने उनकी तनख्वाह बंद करा दी पैसे की तंगी आई तो देवनारायण जी ने शहर की उजला साबुन फेक्टरी में नौकरी कर ली यहाँ उनकी तनख्वाह अच्छी थी सब कुछ सही चल रहा था देवनारायण की ससुराल इन्दौर में थी उनके ससुर गिरधारी लाल किराने की दुकान चलाते थे देवनारायण जब भी ससुराल जाते तो गिरधारीलाल देवनारायण जी से कहते नौकरी में कुछ नहीं रखा धंधा बिजनेस करो उसमें बहुत फायदा है। देवनारायण अपने ससुर गिरधारीलाल से बहुत प्रभावित थे। इधर उजला फेक्टरी में देवनारायण यूनियन के नेता बन गए। फेक्ट्री मालिक अशोक कुमार को यह पसंद नहीं आया। वे देवनारायण जी को नौकरी से हटाने का बहाना ढूँढने लगे। एक दिन देवनारायण जी और अशोक कुमार में खूब गरमागरम बहस हो गई देवनारायण जी ने तैश में आकर इस्तीफा देने की बात कही तो अशोक कुमार जी ने कहा देकर बताओ इस्तीफा जोश में आकर देवनारायण जी ने इस्तीफा दे दिया जिसे अशोक कुमार ने फौरन मंजूर कर लिया। देवनारायण जी को उम्मीद थी कि यूनियन वाले उन्हें बचा लेंगे लेकिन अशोक कुमार के खिलाफ कोई आगे नहीं आया। सेठ ने देवनारायण जी को बाहर का रस्ता दिखा दिया। देवनारायण जी अपनी पत्नी मंगला तथा बेटा अर्पित, बेटी अर्पिता को लेकर ससुराल आ गए ससुर ने कहा अच्छा किया नौकरी छोड़ दी अब देखना बिजनेस में कितनी जल्दी मालामाल हो जाओगे। देवनारायण के पास दो लाख रुपये थे वे दो लाख रुपये ससुर गिरधारीलाल जी ने चिकनी चिपड़ी बात करके ले लिए कहा इससे तुम्हारा बिजनेस खुलवा दूँगा। कुछ दिन तक तो सब ठीक चलता रहा लेकिन एक दिन ससुर ने देवनारायण जी से कहा दामाद जी घर कब तक बैठे रहोगे चलो मेरे साथ दुकान पर वहाँ बिजनेस गुर सीखने का मौका मिलेगा। देवनारायण सहजता से दुकान चले गए लेकिन यहाँ तो कुछ और थी गिरधारीलाल ने दुकान के नौकर को काम से निकाल दिया था। अब देवनारायण जी दुकान के नौकर बनकर रह गए थे उनका साला दिन भर मटर गश्ती करता पर उससे कोई कुछ नहीं कहता देवनारायण जी को दो वक्त की रोटी मिलना भी मुश्किल हो गया। ससुर के सामने होते हुए देवनारायण खाना नहीं खा सकते थे ससुर उनसे इतना कटू व्यवहार करते जो उनसे सहन नहीं होता जब देवनारायण जी की पत्नी मंगला से ये देखा नहीं गया तो वो बोली इस तरह अपना भरा जीवन कब तक जिओगे इन तिलों में तेल नहीं है मुझसे अब आपका अपमान बर्दाश्त नहीं होता चलो यहाँ से निकल चलो। कहीं भीख माँगकर खा लेंगे पर यहाँ नहीं रहेंगे जब देवनारायण जी ने मंगला की बात सुनी तो उसकी हिम्मत बँधी एक दिन उसने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कोई मैं यहाँ मुफ्त की रोटी नहीं तोड़ रहा हूँ दिन भर दुकान पर कड़ी मेहनत करता हूँ तब कहीं आप मुझे रूखी रोटी देते हैं। और अपने निठल्ले बेटे को घी में तर रोटी खिलाते हो यह सुनकर गिरधारीलाल गुस्से से आग बबूला हो गए सारी मर्यादा ताकपर रखकर बोले हरामखोर मुझसे जबान लड़ाता है निकम्मा कहीं का और वे देवनारायण जी को जूते से मारने के लिए लपके ये देखकर मंगला हक्की बक्की रह गई वो दोनों के बीच में आ गई देवनारायण ऊँचा पूरा हट्टा कट्टा जवान था जबकि गिरधारीलाल पाँच फुट के साधारण कद काठी के इंसान थे। देवनारायण जी के संयम का बाँध टूट गया था उन्होंने मँगला को परे धकेला और कहा अगर एक भी जूता पड़ गया तो उठा उठा कर पटकूँगा तथा पटक पटक कर घसीटूँगा समझे तुमने हदपार कर दी मेरे दो लाख रुपये वापस करो गिरधारीलाल देवनारायण के तेवर देख ठिठक गए उन्हें अपनी कमजोरी का अहसास हो गया पर काइयाँ पन नहीं गया था इसलिए बोले कैसे दो लाख रुपये आठ महीने से तुझे और तेरे बच्चों को खिला रहा हूँ ये भूल गया। मँगला ने देवनारायण जी से कहा पिताजी से बहस मत करो उधर गिरधारीलाल बोले अभी के अभी मेरे घर से निकल जाओ मुझे जहरीला नाग घर में रखने का शौक नहीं है। देवनारायण कुछ कहते पर मंगला ने रोक दिया। देवनारायण जी के पास कुछ रुपये थे उनके पास आधा तौले की सोने की अँगूठी थी वो बेचकर मकान किराये से लिया। आवश्यक सामान खरीदा बाकी पैसे धंधे मे लगाए पर फायदे की जगह नुक्सान सौ। ठेले पर रखकर सब्जी बेची उसमें भी नुक्सान हुआ भूखे मरने की नौबत आ गई एक दिन सुबह वो दुखी होकर चाय की दुकान पर बैंच पर बैठे हुए थे। कि समाचार पत्र पर नजर पड़ी जिसमें रघुवीर प्रताप सिंह जी केबिनेट कृषि मंत्री बनने की खबर छपी थी। देवनारायण जी को राह मिल गई थी वो मंगला और अपने दोनों बच्चों को लेकर रघुवर जी के बँगले पर आ गए। रघुवर जी को सारा हाल बताया सुनकर वे बड़े दुखी हुए। मँगला ने रघुवर जी के पैर छुए थे और उन्होंने उसे सदा सुखी रहने का आशीर्वाद दिया था। रघुवर जी ने कहा कि मैंने अभी विधायक वाला सरकारी आवास खाली नहीं किया है तुम बच्चों के साथ उसमें रहो आगे की व्यवस्था मैं देखता हूँ अब चिंता करने की कोई बात नहीं। रघुवर जी ने कन्टनजेन्सी से देवनारायण जी को कृषि विभाग में डिमाॅन्सट्रेटर के पद पर नियुक्ति दिला दी डेढ़ साल बाद जब ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी की सीधी भर्ती निकली तब देवनारायण को विभागीय कर्मचारी का लाभ देकर ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी पद पर पक्की नौकरी दिला दी। और कहा कि सारी नेतागिरी छोड़ दो अच्छे सै नौकरी करो और ठीक से रहो फिर मंगला से कहा देख बेटी सदा सुखी रहो का मेरा आशीर्वाद फल गया न। मँगला आँखों में आँसू भर कर अपने भरे गले से इतना ही बोल पाई बाबूजी और रघवर जी इतना सुनकर ही गदगद हो गए। देवनारायण ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा दस साल की नौकरी में उन्होंने हर सुख के साधन जुटा लिए घर का मकान बना लिया और सुखपूर्वक जीवन यापन करने लगे मँगला इन दस वर्षों में एक बार भी मायके नहीं गई न देवनारायण जी। ससुर गिरधारीलाल को अपने किए की सजा मिली आवारा बेटा दुकान चला नहीं पाया। नौकर रखा था वो चोरी करके भाग गया उधार लेने वालों ने उधारी वापस नहीं की और कभी बड़ी बड़ी डींग हाँकने वाले गिरधारीलाल को उनका लड़का वृद्धाश्रम में छोड़ आया था।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें