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कहानी: जान गँवा दी पर सस्पेण्ड नहीं हुए उमेश सर

प्रधानाध्यापक उमेश सर की सेवानिवृति में छः महीने शेष थे और उनका चुनाव में ड्यूटी करते हुए हार्ट अटेक से दुखद निधन हो गया था गँभीर बीमार होने के बाद भी उनकी ड्यूटी लगाने से उन्हें जान गँवाना पड़ी थी उनके निधन के बाद जो जनआक्रोश का लावा फूटा उसने शासन प्रशासन को हिलाकर रख दिया था।
कुछ दिनों से उमेश जी के हार्ट में ज्यादा तकलीफ हो रही थी स्थानीय डॉक्टर ने उन्हें एंजियोग्राफी की सलाह दी थी। चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी शासन ने अवकाश पर प्रतिबंध लगा दिया था इसलिए उनसे बन नहीं रही थी तब भी वे रोज स्कूल आ रहे थे चुनाव में उनकी ड्यूटी इसलिए नहीं लगी थी क्योंकि संकुल केन्द्र प्राचार्य ने उनकी हालत देखते हुए उनका नाम नहीं दिया था। लेकिन क्षेत्रीय आठवीं फेल विधायक का भतीजा जो सरकारी नौकरी करता था  उसका पत्नी के साथ मसूरी जाने का प्रोग्राम बन गया था। उसकी चुनाव में ड्यूटी लगी थी। विधायक जी के एक फोन से वो ड्यूटी कट गई और उसके स्थान पर उमेश जी की ड्यूटी लग गई जिस दिन उन्हें चेक अप कराने जाना था  उस दिन उनकी चुनाव ट्रेनिंग थी अगर चैक अप कराने जाते और ट्रनिंग में शामिल नहीं होते तो दूसरे दिन उनका सस्पेन्शन लेटर निकल जाता वे नहीं चाहते थे कि बयालीस साल की बेदाग शासकीय सेवा  में  रिटायरमेन्ट के समय दाग लगे इसलिए वे ट्रेनिंग में गए उनकी हालत देखकर उनके साथियों को उन पर बहुत तरस आया सब प्रशासन को कोस रहे थे कि अच्छे भले सवस्थ हट्टे कट्टे लोगों ने जुगाड़ से अपनी डयूटी कटवा ली है और उमेश सर जी जैसे लोगों को पीठासीन अधिकारी बना दिया गया है। साथियों ने कहा कि आप वरिष्ठ अधिकारी से मिल कर अपनी स्थिति बता दो शायद उन्हें तरस आ जाए। और आपकी ड्यूटी कट जाए एक बोले आप तो मेरा नाम ले देना मैं आपकी जगह ड्यूटी कर लूँगा। उमेश सर सीधे सरल और नेक इंसान थे। ईमानदारी से अपनी नौकरी करते रहे थे नगर में उनका बड़ा सम्मान था लोग उनके पैर छूने को लालायित रहते थे। वो हिम्मत करके वरिष्ठ अधिकारी के पास गए। वो अधिकारी बूढ़े कर्मचारियों के प्रति नफ़रत का भाव रखता था। बोला ड्यूटी क्यों कटवाना चाहते हो उमेश जी ने सारी बात बताई डॉक्टर वही बैठे थे अधिकारी ने कहा इनका स्वास्थ्य परीक्षण कर बताओ क्या ये ड्यूटी करने में सक्षम हैं ? डॉक्टर ने उनकी नब्ज टटोली और वो घबरा गए वो कुछ कहने वाले थे कि अधिकारी ने क्रूरता भरी कुटिलता से उन्हें देखा तो डॉक्टर बोले यह ड्यूटी कर सकते हैं। यह सुनकर वरिष्ठ अधिकारी ने उमेश जी को वो लताड़ लगाई जो उन्हें अपने जीवन में कभी किसी ने नहीं लगाई थी नौकरी नहीं करते बन रही तो रिटायरमेंट ले लो क्यों किसी बेरोजगार की जगह रोक कर बैठे हो सबकी ड्यूटी काट दूँगा तो चुनाव कैसे कराऊँगा जाओ यहाँ से और डयूटी पर जाने की तैयारी करो। उमेश जी की आँखो के आगे अंधेरा छा गया वे गिरने ही वाले थे  एक अन्य कर्मचारी ने उन्हें थाम लिया और बाहर बैंच पर बैठा दिया वो डॉक्टर भी नहीं पसीजा। बाहर आए और उमेश जी थोड़े ठीक हुए तो देखा कि रीना मालवीय मेडम रो रही हैं। उनकी किडनी में तकलीफ थी डाइबिटीज बढ़ी हुई थी घुटनों में असहनीय दर्द था। तेज बुखार था पर उनको डॉक्टर ने फिट कर दिया था उनकी डयूटी भी नहीं काटी गई थी वे भी वरिष्ठ अधिकारी की डाँट खाकर आई थीं और दुखी होकर रो रहीं थीं डयूटी केवल उन्हीं लोगों की कटी थी जिन पर किसी बड़े नेता अफसर या विधायक जी का हाथ था बाकी सब को लताड़ कर भगा दिया गया था जिन में पाँच कर्मचारी तो ऐसे थे जिन्हें चुनाव ड्यूटी में झौंकना उनको मौत के मौँह में धकेलने जैसा था पर प्रशासनिक क्रूरता ने इसे नजरअंदाज कर दिया था। उमेश सर जी कह रहे थे भले ही जान चली जाए  पर डयूटी तो करूँगा आखिरी  में अपनी नौकरी में निलंबन  का दाग नहीं लगने दूँगा। 
दो दिन बाद चुनाव थे मतदान दल आ गए थे  सुबह चुनाव सामग्री मिलना थी इसके बाद उन्हें मतदान केन्द्र ले जाया जाना था। उमेश जी की ड्यूटी सबसे दूर के मतदान केन्द्र में लगी थी बस के बाद पन्द्रह किलोमीटर उन्हें ट्रेक्टर से ले जाया गया था। वे जैसे तैसे अपनी डयूटी कर रहे थे दोपहर में एक दबंग नेता आया उसने मतदान केन्द्र पर लगभग कब्जा ही कर लिया उमेश जी असहाय थे सब उसकी जी हुजूरी कर रहे थे उमेश जी इसे सहन नहीं कर पाए अचानक कार्डिएक अरेस्ट आया उनके दिल की धड़कन बंद हो गई और वो गिर गए थोड़ी देर के लिए  अफरा तफरी मची किसी ने उन्हें सी पी आर भी नहीं दिया अस्पताल वहाँ से बहुत दूर था साँस बँद होने के बाद भी पैंतालीस मिनट तक उनके प्राण अटके रहे पर कौन उनका इलाज करता। डॉक्टर एक घण्टे बाद आया जब उसे सूचना मिली तब वो ढाबे पर खाना खा रहा था उसने कोई जल्दी नहीं दिखाई उमेश जी डयूटी करते हुए अपनी जान गँवा चुके थे अपने निलंबन को बचाने की कीमत उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी थी उस दबंग नेता ने पंद्रह मिनठ में उमेश जी को मरा मानकर मतदान केन्द्र से हटवा दिया था सहायक पीठासीन अधिकारी चापलूस टाइप इंसान था दबंग नेता ने जब सन्तयानवे प्रतिशत मतदान करा दिया तब वो वहाँ से चला गया बाकी लोगों ने स्याही तो लगवाई पर मतदान नहीं कर पाए। दबंग नेता को उमेश जी की मौत का कोई दुख नहीं था बीच बीच में कह रहा थे ये हराम की खा रहे हैं एक लाख रुपये तनख्वाह लेते हैं और करते क्या हैं जब काम पड़ता है तो यह हाल होता है। चुनाव तो संपन्न हो गए थे  पर जिन पाँच गँभीर बीमारी वाले कर्मचारियों की डयूटी लगी थी उनमें से एक भी जीवित नहीं बचा था प्रशासन संवेदनहीन था वरिष्ठ अधिकारी पद के नशे में चूर था। डॉक्टर जिसने उन्हें ड्यूटी के योग्य ठहराया था उसका मानसिक सँतुलन गड़बड़ा गया था उनकी जगह पर जो पाँच कर्मचारी गर्मी में मौज मनाने कश्मीर और मनाली गए थे वे खुश होकर लौट आए थे। लेकिन यह घटना बहुत बड़ी थी जनता में जबरदस्त आक्रोश था डॉक्टर को पागलखाने ले जाया गया था कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी सबसे ज्यादा आक्रोश उमेश जी की मौत पर था उनके अंतिम संस्कार में जो जन सैलाब उमड़ा उसे देख वो वरिष्ठ अधिकार काँप गया जिसे वो एक मामूली हैडमास्टर समझ रहा था उसका इतना सम्मान लोगों में उसके प्रति इतना प्रेम  आठवीं फेल विधायक को चार जगह जूतों की माला पहनाई जा चुकी थीं पच्चीस स्थानों पर उनका पुतला दहन किया गया था किसी ने मुँह पर कालिख पोत दी थी आखिर उसे भूमिगत होना पड़ा था पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आ गई थी उसमें साफ लिखा था कि मरने वाले डयूटी के लिए फिट नहीं थे इससे वो वरिष्ठ अधिकारी और डॉक्टर घेरे में आ गए थे मुख्यमंत्री जी को हस्तक्षेप करना पड़ा वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ एफ आइ आर दर्ज कराई गई  अरेस्ट किया गया बीमा कंपनी क्लेम देने में आनाकानी कर रही थी पर कोर्ट के आदेश से दुगुनी राशि कंपनी को देना पड़ रही थी मुख्यमंत्री जी ने भी राहत का पिटारा खोल दिया था। तब कहीं लोगों का आक्रोश शाँत हुआ था।
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रचनाकार
प्रदीप चश्यप 


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