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कहानी: धोखाधड़ी

रामशरण पिछले सात साल से खेती कर रहे थे तथा इसके साथ ही पशुपालन भो चर रहे थे। सात साल पहले वे कस्बे में व्यवसाय करते थे लेकिन बैंक के एजेंट अशोक द्वारा उनके विश्वास का गला घोंटते हुए उनके दस लाख रुपये हड़प लिए थे  इसका उन्हें गहरा सदमा लगा था और तबसे वे अपना कारोबार अपने बेटे नरेश को सौंपकर  खेत पर मकान बनाकर रहने लगे थे वहीं उन्होंने गाय और भैंस भी पाल ली थीं।
आज उनके पास चालीस भैंस और तीस दुधारू गाएँ थीं।  जिनका  दूध निकालकर वे अच्छा मुनाफा कमा रहे थे।और,खुश आठ नौकर पशुओं की देखभाल एवं खेती का कार्य कर रहे थे।वे दूध के अलावा घी मक्खन क्रीम दही मठा एवं मावा भी तैयार कर बेच ते थे। उस सदमें से तो वे उबर गए थे पर जिस तरह अशोक ने उनके साथ लोखाधड़ी की थी उसे वे कभी भूल नहीं पाए थे अशोक जेल में था उसे एक सौ पिच्यासी साल की सजा मिली थी। उसे तो मरते दम तक जेल में ही रहना था अशोक की पत्नी रत्ना ने दूसरी शादी कर ली थी  अशोक के दोनों बच्चे अनाथाश्रम में रह रहे थे।
अशोक जब  नागरिक बैंक का एजेंट था   तब रामशरण की दो दुकाने थीं दोनों अच्छी चलती थी एक दुकान पर उनका  बैटा नरेश बैठता था   वे बैंक एजेंट अशोक को  एक हजार रुपये रोज देते थे कभी दो हजार और कभी पाँच हजार रुपये भी जमा कराते थे वे विगत पाँच सालों से ऐसा कर रहे थे। लगभग दस लाख रुपये वे जमा कर चुके थे एक दिन वे दुकान पर बैठे थे तभी  उनके परिचित सुरेश  ने उनसे कहा अशोक  को आपने ज्यादा रुपये तो नहीं दिए  रामशरण बोले क्यों क्या हुआ सुरेश ने कहा वो हवालात में बंद है कई लोगों के  रुपये हड़प गया नब्बे लाख रुपये का घपला किया है उसने पर पुलिस को  अभी तक उसके पास से सिर्ब बारह लाख रुपये मिले हैं बाकी पैसे कहाँ गए इसका वो कोई जवाब नहीं दे रहा है सतीश की बात सुनकर रामशण सिर पकड़कर बै ठ गऍए बोले मेरा दस लाख रुपये उसके पास जमा हैं। वे बैंक में गए तो  पता चला कि उसने  बैंक में रामशरण का एक भी रुपया जमा नहीं किया था  कस्बे में ऐसे बहुत से लोग थे  जिनके साथ उसने धोखाधड़ी की थी। सबके रुपये डूब गए थे। वो पैसे अशोक ने जुए सट्टे में उजाड़ , दिए थे। सब मनमसोकर रह गए थे। 
बाद में अशोक को  दोष सिद्ध होने पर सजा  मिल गई थी। पर रामशरण जैसे  तो  अभी तक भी सदमें  से नहीउबर पाए थे  । आज वो सब बातें याद कर रामशरण बहुत दुखी  हो रहे थे । हाँलाकि अब भी उनके पास  करोडों की  संपत्ति  थी। और वे सुख से रह रहे थे। 
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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप


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