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कहानी: जहर उतारने वाला

अंचल के गाँव पृथ्वीपुर के ओझा तांत्रिक  बाबा  देवधर को तीन दिन बाद होश आया था  अब उसकी हालत कुछ ठीक थी। उसे ग्राम विकास अधिकारी आलोक ने अस्पताल में भर्ती कराया था वो सर्पदंश का शिकार हो गया था अगर आलोक उसे एक घंटे पहले नहीं लाते तो उसका बचना मुश्किल था। 
जब वह बात करने लायक हुआ तो आलोक के दोनों हाथ जोड़कर बोला अगर आप नहीं होते तो मुझे मरे हुए तीन दिन हो गए होते मैं आपका दुश्मन था फिर भी आपने मेरी जान बचाई आलोक बोले क्योंकि मुझमें इंसानियत थी अब वादा करो जब तक गाँव में रहोगे तब तक सीधे सादे गाँव वालों को तंत्र मंत्र जादू टोना टोटका के खेल में नहीं फँसाओगे न किसी के मेहनत से कमाए रुपयों को हड़पोगे, उसकी जान से खिलवाड़ा करोगे। देवधर ने  पक्का वादा कर लिया था। अब वह भी लोगों को जागरूक कर उनके अंधविश्वास दूर करेगा।
आलोक की पृथ्वीपुर में ग्राम विकास अधिकारी पद पर छः महीने  पहले पोस्टिंग हुई थी शुरू में वे जब आए तो गाँव वालों को अंधविश्वास में जकड़ा देख उन्हें बड़ा दुख हुआ था। गाँव में देवधर का बड़ा सम्मान था गाँव के लोग हर समस्या के लिए देवधर के पास आते और देवधर उनसे पैसे ऐंठता इस वजह से बहुत से लोग  असमय ही काल कवलित हो गए थे। गाँव में जब किसी को साँप काटता तो वे  देवधर के पास आते  देवधर  इलाज का दिखावा करता  झाड़ता फूँकता, अगर मरीज ठीक हो जाता तो देवधर तगड़ी दान दक्षिणा वसूल करता था लोग अस्पताल नहीं  जाते थे  सब उसी से अपना काम कराते  थे। जो मर जाते उन के विषय में कहता उसपर तगड़ी प्रेत बाधा थी। और लोग उसकी बात मान लेते। 
आलोक ने देवधर की जड़े उखाड़नी शुरू कर दी थीं  इससे दोनों के बीच दुश्मनी पैदा हो गई लोग जैसे जैसे आलोक जी की बात मानते वैसे वो देवधर को खटकते  
इसी बीच देवधर को साँप ने काट लिया था आलोक जी  
ने समय पर अस्पताल ले जाकर उसकी जान बचाई थी ।जिससे देवधर आलोक जी का ऋणी  हो गया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप  


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