तीस साल पहले दो यात्री बस,चलाने के परमिट ने सतीश की जिंदगी बदल दी थी राज मिस्त्री का काम करने वाले सोहन का बेटा सतीश अज शहर का सब से धनी व्यक्ति था। शहर के तीन शैक्षणिक संस्थान एक सुपर स्पेशलिटी अस्पता के अलावा शहर के ट्रान्सपोर्ट व्यवसाय एवं होटल व्यवसाय पर उनका एक छत्र राज्य था शहर के सबसे शानदार मकान में सतीश अपने परिवार के साथ रह रहे थे।
तीस वर्स पहले जब सतीश ने एम कॉम किया था तब सतीश की उम्र बाइस साल की थी उसके पिता सोहन की इच्छा थी कि वो सरकारी नौकरी करे लेकिन सतीश व्यापार करना चाहता था पर उसके पास इतनी पूँजी नहीं थी। एक दिन वो अपने बचपन के दोस्त रघु से भिलने गया था रघु पुरातत्व विभाग में चपरासी था उसने नवीं में दो साल फेल होने के कारण पड़ाई छोड़ दी थी इस विभाग में उसकी नौकरी लगे चार साल हो गए थे। बातों ही बातों में रघु ने बताया कि राज्य के परिवहन मंत्री अजय वर्मा यहाँ परिवार सहित दो दिन से ठहरे हुए हैं। मेरी खातिरदारी से बड़े खुश हैं चलो उनसे तुम्हें मिलवाता हूँ रघु उसे विभाग के गेस्ट हाउस में ले गया मंत्री जी जाने की तैयारी चर रहे थे रघु को देखकर बड़े खुश हुए बोले तुम्हारे कारण हमारा यह भ्रमण सफल हुआ है। हम तुम्हें कुछ देना चाहते हैं उन्होंने अपने पी ए उमेश से कहा रघु को अथवा ये जिसे चाहे उसे दो यात्री बस चलाने का रूट देकर उसका परमिट दो दिन में इन्हें तैयार कर के दो। रघु एक चपरासी था और उसकी सोच सीमित थी। वो अपनी नौकरी से खुश था वो परमिट लेने से इंकार करने वाला ही था कि सतीश ने रघु का हाथ दबा कर कहा वो परमिट मुझे दिलवा दे। रघु ने मंत्री जी से कहा ये सतीश है ये मेरा भाई है। मैं चाहता हूँ आप इसे परमिट दिलवा दें। मंत्री जी बोले जैसी तुम्हारी मर्जी। रघु मंत्री जी से हाथ जोड़कर बोला एक और प्रार्थना थी मेरा छोटा भाई दिनेश बेरोजगार है कहीं उसको नौकरी दिलवा दें तो आपकी मेहरबानी होगी । मंत्री जी मुस्कुराए फिर पी ए से कहा दिनेश को कन्टनजेन्सी से भृत्य के पद पर रछवा दो सुनकर रघु की खुशी का ठिकापा नहीं रहा। मंत्री जी के जाने के बाद सतीश ने रघु से कहा ऐसी कौन सी छड़ी फेर दी जो मंत्री जी तुझ से इतने खुश हो गए। रघु ने इतना ही कहा कि ये केन्द्र सरकार का ऑफिस है। इस गेस्ट हाऊस में विभाग के अतिथि के अलावा किसी को ठहरने की अनुमति नहीं है। लेकिन ऑफ सीजन होने से ये गेस्ट हाऊस खाली था रघु ने अपनी जोखिम उठाते हुए गेस्ट हाऊस मंत्री जी को दो दिन के लिए दे दिया था। जिसका ईनाम वो मुझे ये देकर गए हैं।
फिर रघु ने सतीश से कहा तू इस परमिट का क्या अचार डालेगा अपनी औकात मत भूल। सतीश मुस्कुराते हुए बोला तू चिंता मत कर मैं सब मैनेज कर लूँगा। सतीश ने जीवन में कभी फिजूल खर्ची नहीं की थी छात्र वृत्ति और जेब खर्च की पाई पाई बचाकर अस्सी हजार रुपये जुटाए थे। रघु बोला तेरे जो मन मे आए वो कर मुझे कोई परवाह नहीं। सतीश ने सबसे पहले परमिट हासिल किया फिर बस के शोरूम पर पहुँच गया शोरूम का मालिक गुप्ता सतीश को जानता था उसे उसकी क्षमताओं पर विश्वास था। उसने अस्सी हजार के डाउन पेमेंट पर दो बस सतीश को दे दीं । सतीश को मुँहमाँगी मुराद मिल गई थी। उस दौर में बस आवागमन का मुख्य साधन थी सतीश को उससे इतना लाभ हुआ कि डेढ़ साल में उसने दोनों बसे पूरा कर्ज चुकाकर फ्री कर लीं इसके बाद तो वो पाँच साल में सत्तर बसों का मालिक बन गया था अपनी ट्रान्सपोर्ट कंपनी खोलकर चालीस ट्रक से माल का परिवहन किया। जैसे जैसे धन की आवक होती गई वैसे वैसे सतीश अपना कारोबार बढ़ाता गया इस दीवाली पर उसने तीस करोड़ रुपये का बोनस अपने कर्मचारियों में बाँटा था दूसरी और रघु और दिनेश अब भी चपरासी की नौकरी कर रहे थे उन्हें चालीस हजार रुपये महीना तनख्वाह मिल रही थी और वे उसमें ही खुश थे।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें