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कहानी: मन के जीते जीत

बैजनाथ जी एक जन्मदिन पार्टी से देर रात को घर आए थे उस पार्टी में आर्केस्ट्रा में उन्होंने सिन्थेसाइजर बजाया तथा गायन किया था उन्हें तीन घंटे की प्रस्तुति के तीन हज़ार रुपये मिले थे वे रुपये उन्होंने अपनी पत्नी गीता को दे दिए गीता सोई नहीं थी जागकर बैजनाथ जी की प्रतीक्षा कर रही थी।
दुर्घटना में दोनों पैर गँवाने के दो साल बाद  वे फिर से कमाने लायक हुए थे दो साल तक वे एक रूपया भी नहीं कमा पाए थे घर की आर्थिक स्थिति बुरी तरह डगमगा गई थी गीता ज्यादा पढ़ी लिखी थी नहीं तो दूसरों के घर झाड़ू पौंछा लगाकर गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह चला रही थी। दोनों पाँव गँवाने के बाद जो जमा पूँजी बची थीउससे  कुछ महीने तो घर का खर्च चलता रहा  कुछ महीने जेवर बेचकर खर्च चलाया। किसी ने कोई सहायता नहीं की कहीं से उधार भी नहीं मिला लोगों ने ये सोचकर उधार नहीं दिया कि  यह कमाता तो है नहीं अदा कैसे करेगा दोनों बच्चे राम और श्याम सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे गीता ने उनकी पढाई बंद नहीं कराई थी  
बैजनाथ जी दो साल पूर्व अच्छे भले थे ठेले पर सब्जी रखकर बेचते थे और सात सौ से आठ सौ रूपये रोज कमा लेते थे।उससे परिवार की गुजर बसर आराम से हो रही थी। वे एक घर में सड़क को पार कर सब्जी देकर आ रहे थे तभी एक ट्रक अंधी गति से आकर उन्हें रौंदता चला गया उनकी जान तो बच गई पर दोनों पैर चकनाचूर हो गए आखिर डॉक्टरों को उन्हें काटना पड़ा पूरे दस महीने उनका इलाज चला इस बीच गीता ने कैसे गृहस्थी चलाई ये वो ही जानती है। बैजनाथ जी को एक समाजसेवी संस्था ने ट्राइसायकिल दे दी थी। उसे चलाते हुए वे मंदिर में आ जाते  मंदिर में संत सियारामदास बाबा रहते थे वे संगीत के अच्छे जानकार थे  बहुत अच्छा हारमोनियम बजाते थे उनका कंठ स्वर भी अच्छा था बैजनाथ  जी से संतजी की घनिष्टता बढ़ गई थी वे दिन में बैठकर बातें करते कभी बाबा हारमोनियम लेकर भजन गाते और बैजनाथ ध्यान से सुनते जब बाबा हारमोनियम पर धुन निकालते तब बैजपाथ उन्हें गौर से देखता।कुछ दिन पहले संत जी ने पैंतीस हजार का सिन्थेसाइजर लिया था अब वे उसी को प्ले करते थे  हारमोनियम खाली रहता  एक दिन बैजनाथ जी ने संतजी से कहा कि आपकी इजाजत हो तो  इस हारमोनिय को मैं बजा लिया करूँ। संत जी ने इसकी इजाजत दे दी बैजनाथ पूरे दिन लगन से हारमोनियम  को बजाकर धुन निकालने का प्रयास करते उनकी लगन देख संत जी पिघल गए और बैजनाथ को  हारमोनियभ बजाने की इजाजत मिल गई  बैजनाथ जी को दिन रात यही धुन सवार रहती कि कैसे वे धुन निकालें धुन बनाएँ।सियाराम बाबा अब बैजनाथ जी  को संगीत सिखाने लगे थे छः महीने में तो वो पूरी तरह संगीत  सीख चुके थे हारमोनिय अच्छे से बजाना आ गया था। अब संतजी अपना सिन्थेसाइजर  भी बैजनाथ  को देने लगे थे। चार दिन के लिए जब संत जी बाहर गए तो अपना सिंथेसाइजर बैजनाथ  जी को दे गए  उनकी प्रस्तुती  ने सब का मन  जीत लिया था । जब संतजी को इस बात का पता चला  तो उन्हें बड़ी खुशी हुई । संतजी ने खुश होकर उन्हें हारमोनियम उपहार  में दे दिया। वे उसे घर पे ले आए और लगातार अभ्यास  से वे गायन और वादन में कुशल हो गए।अब उन्हें कार्यक्रमों  में बुलाया जाने लगा  था इससः उन्हें  धनराशि प्राप्त होती  उससे घर की स्थिति  सुधार ते कभी शादी के सीजन में  उन्हें बैंड बाजे वाले  उन्हें ले जाते  जहाँ से वे  छः से  आठ हजार रुपये की  आय हो जाती।  गरीबी दूर हुई तो महमानों का आना जाना शुरू हो गया था। बैजनाथ  जी  भी दुर्भावना भूल  सबका तहे दिल से स्वागत करने  लगे थे उनकी सँगीत साधना ने  घर की खुशियाँ लौटा दी थी।

रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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