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कहानी: आतंक से मुक्ति

बिशन खेड़ा के नवागत युवा टी आई  शिवनारायण अवस्थी ने क्षेत्र के दुर्दाँत डाकू मंगल सिंह को उसकी गैंग सहित पुलिस एनकाउण्टर में मार गिराया था पहले तो लोगों को इस बात पर भरोसा ही नहीं हुआ कि मंगल सिंह ने एक दर्जन पुलिस कर्मियों की बेरहमी से हत्या की थी तथा दो पुलिस सब इंस्पेक्टरों को अगुवा कर उनके शस्त्र छीनकर जान से मारा था तथा उनके शव को थाने भिजवा दिया था। सरकार ने मंगलसिंह को जिंदा या मुर्दा पकड़कर लाने वाले को दस लाख के इनाम की घोषणा की  थी अन्य जो डाकू मारे गए थे वो सभी इनामी डकैत थे।
मंगल सिंह के सफाए से सबको आतंक से मुक्ति मिली थी शिवनारायण की हर ओर प्रशंसा हो रही थी क्योंकि ऐस बड़े काम को अंजाम देने के लिए वे अपने साथ चुने हुए कुल आठ जाँबाज जवान ले गए थे। जिन्होंने डाकुओं को भागने का मौका दिए बगैर धराशायी कर दिया था।
शिवनारायण अवस्थी जी की उम्र महज चौबीस साल की थी पुलिस विभाग आए उन्हें अभी दो वर्ष ही हुए थे। लेकिन अपनी योग्यता के बल पर वे दो वर्षों में ही उपनिरीक्षक से निरीक्षक पद पर पदोन्नत कर दिए गए थे राज्यपाल का वीरता पुरूस्कार भी उन्हें मिल चुका था। जब डाकू मंगल सिंह का आतंक हद से ज्यादा बढ़ गया तब  प्रदेश के आई जी महावीर सिंह जी ने शिवनारायण अवस्थी को बुलवाया तथा  इस संबेध में चर्चा की। अवस्थी जी उस समय उपनिरीक्षक थे जब उन्होंने इस चुनौती को सहर्ष स्वीकार कर लिया तब आई जी साहब ने अवस्थी जी को फ्री हैण्ड करने के लिए बारी से पहले पदोन्नत कर इंस्पेक्टर बनाया गया प्रदेश मंत्री मंडल की केबिनेट में इसकी मंजूरी दी गई। आई जी साहब ने यह भी कहा कि आप अपने दल में  अपने अनुसार किसी भी पुलिस कर्मी को शामिल करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसके साथ ही अवस्थी जी की पदस्थापना थाना प्रभारी के रूप में डाकू मंगलसिंह के इलाके में स्थित  थाना बिशन खेड़ा में कर दी गई। डाकू मंगल सिंह को जब इसका पता चला तो उसे बड़ी खुशी हुई साथियों से बोला बड़े दिनों बाद शेर के शिकार का मौका मिला है अब आएगा मजा। उसने अवस्थी जी के पटभार ग्रहण करने से पहले ही ऐसी लूट की जो अवस्थी जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हो गई। चार दिन पहले डाकू मंगल सिंह भेष बदल कर बिशन खेड़ा आया यहीं के माध्यमिक स्कूल में शिवनारायण अवस्थी जी के पिता गौरीशंकर अवस्थी जी प्रधानाध्यापक थे। वे जब स्कूल में थे तब मंगलसिंह उनके घर गया उसने दरवाजा खटखटाया दरवाजा शिवनारयण जी की माँ  गिरिजा जी ने खोला मंगल सिंह ने सिद्ध तांत्रिक का वेश धारण कर रखा था। उसने जादू टोने का डर दिखाकर गिरिजा को बहुत डराया फिर कुछ चमत्कार दिखाए जो हाथ की सफाई वाले थे गिरिजा जी उसे असली तांत्रिक समझ बैठीं थीं वे उसकी बातों में आ गईं उसने घर के सारे गहने जेवर नगदी उनसे मँगवा ली। पर एक डिब्बा मँगवाया उसमें हाथ की सफाई से ऐसा दिखाया जैसे वो सारे जेवर उसमें रख रहा हो  और फिर उन्हें सफाई से गायब कर दिया डिब्बे को लाल कपड़े में बाँधकर लटका दिया तथा कहा कि  रात को आठ बजे से पहले इसे छूना भी मत आठ बजे जब इसे खोलोगी तो जो नगदी इसमें रखी है वो दोगुनी हो जाएगी तो जेवर भी डबल हो जाएँगे भोली भाली उसकी बातों में आकर लुट चुकी थीं इसका उन्हें पता तक नहीं था। मंगल सिंह के जाने के बाद शाम को पाँच बजे गौरीशंकर अवस्थी जी स्कूल से आए पर गिरिजा ने उन्हें कुछ नहीं बताया। आठ बजे वो पूजा की थाली सजाकर लाई डिब्बे की पूजा करने के बाद गौरीशंकर जी से नारियल चढ़वाया फिर जब कहा कि आज दोपहर में सिद्ध तांत्रिक आए थे। उन्होंने अपना धन एवं जेवर दुगुने कर के इस डिब्बे में रख दिए हैं जेवर बीस लाख रुपये की कीमत के थे जो शिवनारायण की शादी के लिए बनवाकर रखे गए थे तथा दो लाख रुपये नगद थे। गौरी शंकर जी फौरन समझ गए कि गिरिजा ठगी का शिकार हो गई हैं। डिब्बा खोला तो उसमें कुछ नही था सिर्फ एक कागज का टुकड़ा था जिसमें लिखा था नवागत टी आई के स्वागत में। मंगल सिंह की ओर से नजराना। गिरिजा जी अचेत हो गईं थी जैसे तैसे उन्हें होश में लाया गया गौरीशंकर जी ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वे चौबीस घंटों में जेवर नगदी मंगल सिंह से ले आएँगे वे गए भी सही मंगल सिंह से मिलने तो मंगलसिंह ने उनसे कहा अगर अपने इकलौते लड़के की जान की सलामती चाहते हो तो चुप रहो और अपने बेटे से कहो कि वो कहीं और तबादला करा ले। शिवनारायण जी जब घर आए तो माता पिता का चेहरा देखकर ही समझ गए कि कुछ तो गड़बड़ी हुई है। मंगल सिंह की इस वारदात की खबर पूरे बिशनखेड़ा में फैल गई थी शिवनारायण जी को यह पता नहीं था कि मंगल सिंह ने ये वारदात उनके घर में ही की है। उन्होंने वो डब्बा देखा और कागज का टुकड़ा देखा देखकर मुस्कुराए बोले मंगल सिंह मरने की इतनी जल्दी ठीक नहीं फिर भी जैसी तुम्हारी इच्छा। शिवनारायण जी सीधे थाने आ गए बिशनखेड़ा गाँव में उनका बचपन बीता था चप्पे चप्पे का उन्हें पता था रात को ठीक दो बजे वे मंगलसिंह के ठिकाने पर पहुँच गए उनके साथ शस्त्र से लैस आठ जाँबाज पुलिस के जवान थे अवस्थी ने मंगल सिंह को ललकारा मंगल सिंह ने तुरंत मोर्चा सम्भाल लिया और उनके बीच मुठभेड़ शुरू हो गई। इतने बड़े डाकू का गिरोह सहित सफाया उन्होंने महज डेढ़ घंटे चली मुठभेड़ में कर दिया। पूरे बारह डाकू तथा मंगल सिंह की लाशें पड़ी हुईं थीं पुलिस के दो जवान घायल हुए थे एक को जाँघ में गोली लगी थी दूसरे की दायीं भुजा में। अवस्थी जी ने उन्हें तुरंत अस्पताल पहुँचा दिया था यह खबर आग की तरह चारो तरफ फैल गई सुबह होते ही घटना स्थल पर इतनी भीड़ हो गई कि उसे काबू करना मुश्किल हो गया था। सुबह कस्बे का ज्वेलर लक्ष्मीनारायण काँपते हुए शिवनारायण जी से मिला उसने पूरे जेवर तथा नगदी अवस्थी जी को दे दिए और कहा कि अब तो आप ही मुझे बचा सकते हैं। शिवनारायण जी ने कहा आगे देखेंगे अभी तुम जाओ मेरी अनुमति के बिना कस्बा छोड़कर कहीं मत चले जाना नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। अवस्थी जी सीधे घर गए माँ गिरिजा से कहा कि देखो माँ चौबीस घंटे भी नहीं हुए और मैं सारा जेवर नगदी ले आया अब तो खुश हो। गिरिजा जी की जान में जान आई उनके चेहरे की खुशी लौट आई थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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