माँगीलाल पूरे पन्द्रह साल बाद अपने गाँव आया था उसके छोटे भाई रमेश की लड़की संगीता की शादी थी । वह गाँव में घूमने निकला तो उसे बचपन का दोस्त हेमराज मिल गया हेमराज उसे घर ले गया था घर पर उसने अपनी पत्नी रामवती को आवाज देकर बुलाया देखो तो कौन आया है। रामवती की उम्र अठ्ठावन वर्ष की हो गई थी अब वो नाती पोते वाली हो गई थी। माँगीलाल और हेमराज भी साठ वर्ष के हो गए थे रामवती बाहर आई और माँगीलाल को अजनबी समझ जाने लगी तभी हेमराज ने कहा जरा गौर से तो देख और फिर पहचान ये कौन है माँगी लाल भी बोले हाँ बताओ भाभी मैं कौन हूँ। अचानक वो पहचान गई और बोली माँगी भैया। उसे पैंतीस वर्ष पुरानी घटना याद आ गई और फिर अपने तेवर में आकर बोली मरी का खाया तुम्हारे कारण मैं ससुराल आई थी नहीं तो मैं तो हमेशा के लिए तुम्हारे दोस्त को छोड़कर गई थी और किसी भी हाल में आने वाली नहीं थी। अब माँगीलाल भी बोले मैंने क्या गलत किया था आपके घर को बसाया आपकी गृहस्थी नहीं उजड़ने दी। सुनकर रामवती नरम पड़ गई हाँ भैया तुम सही कह रहे हो तुमने उस समय मुझे बड़ी दिलासा दी थी और कहा था कि अपने जीते जी भाभी आपके साथ ससुराल में कुछ गलत नहीं होने दूँगा तुम जब तक गाँव में रहे तब तक मुझे तुम्हारी हिम्मत रही। अब हेमराज बोले तो बता मेंने तुझे कौनसे दुख दिए। रामवती ने कहा कि माँगीलाल को मैं इसलिए मानती हूँ क्योंकि उसके कारण मुझे आपका साथ मिला आप जैसे अच्छे इंसान को छोड़ने के पाप से मुझे माँगीलाल ने बचाया और उस समय जब आप बहुत गुस्से मे थे तब माँगीलाल भैया ने ही आपको संभाला था। माँगीलाल उनकी बात सुन मुस्कुरा रहे थे उन्हें पैंतीस साल पुरानी घटना की याद ताजा हो गई थी।
रामवती तब ससुराल में गौने के बाद आई थीं हेमराज का थोड़ा अक्खड़ स्वभाव था।ननद और सास से रामवती सहमी हुई रहती थीं तीन महीने जैसे तैसे उन्होंने ससुराल में निकाले फिर रामवती के पिता घीसीलाल राखी पर रामवती को लेने आए रामवती को तो मुँहमागी मुराद मिल गई। मायके आने के बाद रामवती एक घंटे तक माँ से लिपटकर रोती रही। फिर बोली माँ मैं अब ससुराल कभी नहीं जाऊँगी।
पूरे दो साल हो गए मायके में पर रामवती नहीं गई। हेमराज के पिताजी बड़े भाई गाँव के प्रतिष्ठित लोग कई बार रामवती को लेने गए। पर वो मायके से टस से मस नहीं हुई। एक दिन हेमराज ने अपनी व्यथा माँगीलाल से कही माँगीलाल ने कहा मेरे पास एक तरकीब है। तुम्हें थोड़ा अभिनय करना पड़ेगा। हेमराज बोला मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ। हेमराज की ससुराल उसके गाँव चैनपुर से तीन कोस दूर गवाखेड़ा में थी उस समय बस के साधन नहीं थे ना ही सडके थीं दोनों पैदल ही हैमराज की ससुराल गए उनकी खूब आवभगत हुई लेकिन दूसरे दिन जब रामवती की विदा की बात उन्होंने की तो घीसीलाल जी ने रामवती को भेजने से मना कर दिया माँगीलाल ने हेमराज को हाजमा की गोली पहले से ही दे रखी थी। माँगीलाल ने जैसे ही इशारा किया हेमराज ने वो गोली खाकर छटपटाने का अभिनय किया उसकी यह हालत देखकर सब घबरा गए। हेमराज बेहोश होने का नाटक कर रहा था। माँगीलाल ने घीसीलाल जी से कहा लगता है इसने कुछ जहर जैसा खा लिया है मैं इसे होश में लाने की कोशिश करता हूँ अगर इसे यहाँ कुछ हो गया तो पुलिस केस हो जाएगा और आप सब फँसोगे ऐसा करो आप रामवती को फौरन हमारे साथ विदा कर दो रस्ते में अगर हेमराज के साथ कुछ हो जाए तो आप पर बात नहीं आएगी घीसीलाल एक साधारण इंसान थे और पुलिस से डरते थे तुरत फुरत रामवती को विदा किया माँगीलाल के अनुसार हेमराज होश में आ गया था। तथा लड़खड़ाकर चल रहा था माँगीलाल उसे सहारा देकर रामवती को विदा कराकर चले करीब एक कोस तक हेमराज ऐसे ही चलता रहा रामवती घबराई हुई पीछे चल रही थी इसके बाद हेमराज ठीक से चलने लगा फिर रामवती ने देखा वे दोनों आपस में खूब हँसी मजाक कर रहे हैं रामवती समझ गई थी कि दाल में कुछ काला है जब चैनपुर गाँव नजदीक आ गया तो हेमराज ने माँगीलाल से कहा इसने दो साल से बहुत परेशान किया है मेरी इच्छा हो रही है कि घर जाने के पहले इसकी तबियत से मरम्मत कर दूँ। रामवती ने यह बात सुन ली थी और घबरा गई थी उसे लगने लगा था कि हेमराज उसकी पिटाई कर अपना गुस्सा निकालेगा पर माँगीलाल बीच में आ गया बोला खबरदार अगर भाभी को हाथ भी लगाया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा मैं इन्हें फिर से मायके छोड़ आऊँगा। इससे रामवती को थोडी सांत्वना मिली हेमराज बोला ठीक है भाई जब तेरी इच्छा है तो मैं इसे हाथ भी नहीं लगाऊँगा। माँगीलाल हेमराज रामवती एक पेड कै नीचे बैठे वहाँ माँगीलाल ने हेमराज से कहा मैंने पे सोचकर तेरी मदद की है कि तू भाभी से कभी गलत व्यवहार नहीं करेगा मारपीट तो कभी नहीं करेगा अगर पक्का वादा करता है तो ठीक वरना मैं भाभी को जैसे लाया था वैसे ही उनके घर छोड़ आऊँगा माँगीलाल की बात सुन हेमराज ने रामवती के साथ कभी मारपीट न करने की कसम खाई रामवती सुनकर चुप रही तब कहीं वे वहाँ से आगे बढ़े हेमराज ने अपना वादा पूरी तरह निभाया अब जब भी माँगी लाल का आमने सामना रामवती से होता वे कहते और भाभी कैसी तो वो कहती मरी का खाया और माँगीलाल जोर से हँस देते। यह घटना पैंतीस साल पुरानी थी जो अब ताजी हो गई थी रामवती को पूरे दस साल तक हेमराज ने मायके नहीं जाने दिया था वो तो जब रामवती की दादी का निधन हुए तब मायके गई थी और तेरहवीं कर वापस हेमराज के पास आ गई थी इन दस सालों में रामवती दो बेटे तथा एक बेटी की माँ हो गई थी और वो सुखपूर्वक हेमराज के साथ रह रही थी पर माँगलाल को देखकर मरी का खाया कहना उसने आज भी बंद नहीं किया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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