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कहानी: अलग होने के बाद

संयुक्त परिवार का पुक्षधर रहे शिवम को संयुक्त परिवार सः अलग हुए दस वर्ष हो गए थे इन दस वर्षों में उसने खूब तरक्की की थी खुद का घर बनवा लिया था तथा कार  खरीद ली थी वो बेहतर जीवन जी रहा था उसके दोनों बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे उसकी पत्नी सरला भी सुछपूर्वक रह रही थी। जब वह दस वर्ष पूर्व के हालात याद करते थे तो काँपकर रह जाते थः।
शिवम की शादी हुए बीस वर्ष हो गए थे उसकी लड़की निशा की उम्र अठारह वर्ष की थी उसने बारहवीं में चौरानवे प्रतिशत अंक प्राप्त कर प्राविण्य सूची भें स्थान प्राप्त किया थे उसका लड़का नवीन पन्द्रह वर्ष का था तथा उसने नवीं की परीक्षा में पिच्यासी प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। बीस पूर्व जब शिवम  और सरला की शादी हुई  थी  उस वक्त उसका छोटा भाई आशुतोष  बी एस सी कर रहा था तथा उसकी बहन सरिता बारहवीं में पढ़ रही थी उसके पिता मोहन  एक प्राइवेट फेक्टरी में काम करते थे उनकी तनख्वाह बहुत कम थी। शिवम की माँ  लक्ष्मी एक घरेलू महिला थी शिवम हायर सेकेण्डरी स्कूल में व्याख्याता था  वो संयुक्त परिवार में विश्वास करता था  जब शादी होने जा रही थी उसके पहले वो सरला  से यही कह के आया था कि  वो संयुक्त परिवार में ही रहेगा अपने माँ बाप बहन भाई को छोडकर कभी अलग नहीं होगा सरला  ने भी शिवम की ये बात मान ली थी  शिवम ने बचपन में बहुत  गरीबी देखी थी उसकी माँ  ने  भी  गरीबी में अपना समय बिताया था। शिवम को भी उसके पिताजी ने आठवीं पास होते ही पार्ट टाइम जॉब पर लगवा दिया था। शिवम ने आठवीं के बाद सारी पढ़ाई अपने खुद के खर्च से की थी शिवम की सरकारी नौकरी लगने  से उनके परिवार के दिन सुधरे थे  शिवम  नौकरी के  अतिरिक्त कॉपी जाँचने प्रतियोगी परीक्षाओं में ड्युटी करने से तथा ट्यूशन पढ़ाने से भी पैसा कमा लेता था। तब उनका मकान कच्चा था जब शिवम ने नौकरी की उस समय शिवम की तनख्वाह उसके पिता की तनख्वाह से तीन गुना अधिक थी शिवम पूरी तनख्वाह माँ के हवाले कर देता जो अतिरिक्त कमाई होती वो भी माँ को दे देता तीन साल की नौकरी से जो कमाई हुई उससे उन्होंने अपना घर पक्का बना लिया था।  अब शिवम की शादी के लिए रिश्ते आने लगे थे इधर उसकी बहन सरिता भी  जवान हो रही थी। शिवम को अपनी जिम्मेदारी का अच्छी तरह अहसास था। सरला  से शादी के बाद भी वो पूरी तनख्वाह माँ को देता रहा घर में संपन्नता आई सरला  काफी दहेज लाई थी नगद राशि भी मिली थी वो सब शिवम की मम्मी ने अपने कब्जे में कर लिया था। शादी के कुछ दिनों तक तो ठीक चला इसके बाद घर का वातावरण विषाक्त होने लगा जिसमें उसकी बहन सरिता का बढ़ा योगदान था वो अपनी माँ को सरला के खिलाफ भड़काती झूठी चुगली लगाती  उसका भाई आशुतोष भी सरला को परेशान करता उसके पिता तटस्थ रहते सरला ने जब निशा को जन्म दिया तो लक्ष्मी ने खुशी जाहिर नहीं की  शिवम सरला का पक्ष लेता तो सभी को बुरा लगता सरला सुब्ह छ़ बजे से रात के ग्यारह बजे तक काम करती फिर भी शिवम को छोड़ उससे सहानुभूति रखने वाला कोई नहीं था  सरला के बेटे की माँ बनने के बाद भी उससे बुरा बर्ताव किया जाता था । वो शिवम से भी भेद करने लगी थी उसका छोटा भाई आशुतोष कुछ नहीं कमाता था तब भी ठाठ से रहता था और शिवम को सौ रुपये भी कई बार माँगने के बाद मिलते थे घर में रोज कलह होती  एक ही घर में सबसे ज्यादा कमाने के बाद भी शिवम तथा उसकी पत्नी एवं बच्चे अभाव में जी रहे थे दूसरी और लक्ष्मी आशुतोष और सरिता शिवम के पैसों पर मौज कर रहे थे वे खूब बेदर्दी से पैसे उड़ाते पर माँ उनसे कुछ नहीं कहती शिवम के बच्चों को दूध नहीं मिलता था। और आशुतोष सरिता केशर बादाम पिश्ता वाला दूध पीते।  एक दिन शाम को शिवम घर आया तो देखा उसके दोनों बच्चे दरवाजे के बाहर खड़े रो रहे हैं  और सरला ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया है   शिवम की माँ और बहन कह रहे हैं सब त्रिया चरित है ऐसे कोई नहीं मरता थोड़ी देर बाद खुद दरवाजा खोलकर बाहर आ जाएगी शिवम को मामला समझते देर नहीं लगी। दो दिन  पहले कमरे के दरवाजे  की अंदर की तरफ की कुंडी टूट गई थी  ऊपर की तरफ सिटकनी लगी हुई थी जो कमजोर थी। शिवम ने पूरी ताकत से दरवाजे को धक्का दिया दरवाजा एक झटके से खुला तो देखा कि सरला फाँसी का फंदा बनाकर उस पर लटकने ही जा रही थी शिवम अगर वक्त पर नहीं आता तो उसके बच्चे बिन माँ के हो जाते। शिवम की माँ के चेहर पर कुटिलता थी उसकी बहन के चेहरे पर कठोरता । शिवम में कहा माँ अगर ये मर जाती तो  वो बोली तो अपनी जान से जाती हमारा क्या ले जाती तेरी तो मैं दूसरी शादी करा देती। शिवम कड़वा घूँट पीकर रह गया  उस दिन उसने सरला को अच्छे से समझाया चाहे कैसे भी हालात हों आत्म हत्या नहीं करना है इस घटना के बाद शिवम का मोहभंग हो गया था वे सब शिवम के बच्चों को बेदर्दी से मारते फिर भी शिवम उन्हीं के बीच रह रहा था। उसने काफी दौड़धूप कर सरिता के लिए वर ढूँढ निकाला उसका नाम अशोक था। उसकी माँ लक्ष्मी ने सरला के दहेज का अधिकाँश सामान सरिता को दे दिया था और वे कुछ कह नहीं सके थे आशुतोष भी पिता की ही फेक्टरी में नौकरी करने लगा था। शिवम ने उसकी शादी भी करा दी थी आशुतोष को शिवम से बहुत कम तनख्वाह मिलती थी। पर वो माँ के अंधे मोह के कारण ठाठ से रहता था शिवम ने विचार किया कि सरिता की शादी हो गई घर में सरला की देवरानी आ गई है  अब सब कुछ ठीक हो जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ सरला और शिवम की स्थिति नौकरों से भी बदतर रही आशुतोष तो माँ का लाड़ला था ही अब आशुतोष की पत्नी ने सरिता की जगह ले ली थी वो सास की लाड़ली हो गई थी। एक दिन शाम को जब शिवम घर आया तो देखा कि घर में खूब लड़ाई हो रही थी आशुतोष ने शिवम के मासूम बच्चे को उसकी पत्नी के कहने पर घसीट घसीट कर मारा था। और जब सरला ने विरोध किया तो आशुतोष ने अपनी माँ समान भाभी को भी पीट दिया था इसके बाद भी वक्ष्मी आशुतोष तथा उसकी पत्नी की तरफदारी कर रही थी। और आखिर में लक्ष्मी ने जहर उगलते हुए कह दिया तुम्हें अलग होना है तो फौरन ये घर छोड़कर चले जाओ  लेकिन यहाँ से तुम्हें फूटी कौडी भी नहीं मिलेगी ना ही इस घर में तुम्हारा कोई हिस्सा रहेगा। शिवम ने सरला की तरफ देखा और घर से अलग होने का निर्णय ले लिया था ।उन्होंने किराये का मकान ले लिया और अलग हो गए  अलग होते समय माँ ने कुछ नहीं ले जाने दिया तथा खूब कोसा खूब श्राप दिया बददुआएँ देती रही।  और शिवम तथा सरला बच्चों को ले अलग हो गए शिवम ने दो लाख रंपये फंड निकाला उससे गृहस्थी का सामान लिया  इस तरह अपनी शुरूआत की इन दस वर्षों में शिवम ने तो खूब तरक्की की पर लक्ष्मी का श्राप उल्दा उन्हीं को लग गया पिताजी रिटायर हो गए आशुतोश की नौकरी छूट गई मकान बिक गया जेवर रकम सब बिक गए शहर की गंदी बस्ती में वो रहने लगे आशुतोष सब्जी का ठेला लगाकर किसी तरह परिवार पाल रहा था। लक्ष्मी का तो बुढ़ापा आशुतोष की पत्नी ने खराब कर दिया था। वो एक तंग कोठरी में रहकर अपना समय काट रही थी।  शिवम ने इसके बाद कभी उनसे संपर्क करने की कोशिश नही की थी। उसे पता ही नहीं था कि वे कहाँ रह रहे हैं और किस हाल में रह रहे हैं।
*****
रचनाकार 
प्रदीप कश्यप 


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