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कहानी: लौट आए

तीस वर्ष की अवस्था में अपने माँ पिता से अलग हुए राम किशोर और उनकी पत्नी रमा साठ वर्ष की आयु में हमेशा के लिए अपने बयासी वर्ष बूढ़े पिता और अस्सी वर्ष बूढ़ी माँ के पास रहने आ गए थे। 

उनकी माँ पार्वती और पिता हर प्रसाद  उन्हें अपने बीच देखकर बड़े प्रसन्न थे।हर प्रसाद के पास तीस एकड़ उपजाऊ जमीन थी। जिसे उन्होंने अभी तक रखी थी बीच भें कई बार मौके आए पर उन्होंने एक एकड़ जमीन भी नहीं बेची। हरप्रसाद जी खेती तो मजदूरों से कराते थे पर खेती की पूरी देखभाल वे ही करते इसिलिए बयासी वर्ष की आयु में भी वे साठ पैंसठ से अधिक के नहीं लगते थे। घर उनका बहुत बड़ा था जिसमें वे दोनों प्राणी रहते थे।रामकिशोर और रमा के आ जाने से अब उनकी संख्या चार हो गई थी। घर में किसी चीज की कोई कमी थी। रामकिशोर और रमा को यहाँ आकर बहुत अच्छा लग रहा था। 
रामकिशोर जी जब रमा के कहने पर तीस वर्ष पूर्व ये घर छोड़कर गए थे तब हर प्रसाद और पार्वती बहुत उदास हुए थे। तब हर प्रसाद ने यही कहा था बेटा इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए तुम्हारे लिए खुले हैं जब चाहे तुम यहाँ आ सकते हो यह घर हमेशा तुम्हारा ही रहेगा तब रामकिशोर ने मन में यही सोचा था कि अब यहाँ लौटकर कौन आएगा बडी मुश्किल से तो अलग हुए हैं। इसकी भूमिका तो बहुत पहले से बन रही थी तब रमा का लड़का अभिषेक छः वर्ष का तथा बेटी तानिया तीन वर्ष की थी  रामकिशोर शिक्षा विभाग में एल डी सी थे  वे शहर में अकेले रह रहे थे तथा कभी शुक्रवार और कभी शनिवार को आते थे और सोमवार को सुब्ह सात बजे चले जाते थे। जब वे आते तो रमा कहती हमें भी अपने साथ ले चलो कब तक हम इस गाँव में रहेंगे यहाँ क्या है कोई अच्छा स्कूल भी नहीं है मुझे तो अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है। और जब रामकिशोर जी का प्रमोशन हुआ वे बड़े बाबू बन गए तथा उनका तबादला बड़े शहर हो गया  तो रमा को मौका मिल गया उसने कहा अब तो आप तीन सौ किलोमीटर दूर हो जाओगे अब आप हर शुक्रवार को नहीं आ सकेगो पिताजी से अलग होने की बात क्यों नहीं करते  रमा की बात सुनते सुनते एक दिन हिम्मत कर के रामकिशोर ने हरप्रशाद जी से अलग होने की बात कह दी और अपना सामान पैक कर दोनों बच्चों को लेकर चले गए उनके जाने से घर सूना हो गया था। लेकिन उन्होंने अपने खेत में काम करने वाले हरखू को घर का एक हिस्सा रहने को दे दिया  हरखू और उसकी पत्नी सौरम के भी दो बच्चे थे उनके आने से घर की रौनक लौट आई थी। हर प्रसाद हरखू को बेटे की तरह मानते थे। उधर रामकिशोर और रमा शहर आ गए  एक दो कमरे का छोटा मकान किराये से लिया उसका भी किराया उनके वश के बाहर था पर रहना जरूरी था। बच्चों का एडमीशन करा दिया गया था। रामकिशोर और रमा ने  अपने सुखों को  तिलाँजलि देकर  दोनों बच्चों के भविष्र सँवारने में पूरा जीवन लगा दिया  जिसके कारण बेटी तानया डॉक्टर बनी और बेटा अभिषेक चार्टर्ड एकाउण्टेन्ट तानया ने डॉक्टर रविकुमार से प्रेम विवाह कर माता पिता से हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लिया था एक दिन अभिषेक ने रामकिशोर जी को नीलिमा से मिलवाया  तथा कहा मैं इससे शादी कर रहा हूँ इसके पिता रोशन गुप्ता शहर के बड़े उद्योग पति हैं। वो दहेज में हमें रहने को बँगला दे रहे हैं।  सुनकर रामकिशोर बड़े खुश हुए बोले सारा जीवन दो कभरे के मकान में रहकर गुजारा अब बहू बेटे के साथ बँगले में रहने को मिलेगा हमारा बुढ़ापा आराम से कटेगा तभी अभिषेक ने कहा शादी के बाद आप हमारे साथ नहीं रहेंगे नीलिमा आपको नहीं रखना चाहती इसलिए आप इसी किराये के मकान में रहेंगे। और अभिषेक ने ऐसा किया भी शादीश के बाद वो अपनी पत्नी के साथ सीधे बँगले  में शिफ्ट हो गया बँगला बहुत शानदार था कॉलोनी भी पॉश थी।  इधर राभकिशोर भी सेवानिवृत्त हो गए थे। उन्हें अपने पिता हरप्रसाद की बहुत याद आ रही थी रमा को भी अपने किए पर पछतावा था आखिर हिम्मत कर रामकिशोर ने अपने पिताजी को फोन लगाया । वो फोन जो उसके पिताजी उसे बार बार करते थे और वो उसे उठाता नहीं था लेकिन उसके पिताजी ने दूसरी रिंग में ही उठा लिया था और बोल रसे थे बेटा ठीक तो हो कोई परेशानी तो नहीं कैसे फोन किया।  रामकिशोर बोले पिताजी मैं रिटायर हो गया हूँ और गाँव आकर रमा को लेकर आपके साथ रहना चाहता हूँ। सुनकर हरप्रशाद बोले ये तो अच्छी बात है बेटा आ जाओ तेरा ही तो घर है। और रामकिशोर जी गाँव आ गए थे गाँव आने के पहले उन्होंने  अभिषेक से मिलने की  एवं फोन पर बात करने की खूब कोशिश की पर सफल नहीं हो सके।आखिर बिना मिले ही गाँव आ गए।जहाँ माता पिता ने  खूब आपनापन तथा प्यार दिया ।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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