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कहानी: निकम्मा

पूरे पैंतीस साल तक अपने निकम्मे पति नंद किशोर की पत्नी शीला का पचपन वर्ष की आयु में गर्भाश्य के कैंसर के कारण दुखद निधन हो गया था।  वो अपने पति से चार साल छोटी थी चार साल पूर्व उसके पति नंदकिशोर का अधिक शराब का सेवन करने से लीवर खराब हो जाने के कारण  मौत हुई थी तबसे शीला गाँव के सरकारी स्कूल में मध्यान्ह भोजन बनाती थी तथा बाकी समय में दूसरों के खेत में काम करके भी कुछ रुपया  कमा लेती थी ।
शीला के दो बेटे और दो बेटिया थीं शीला ने अपने जीते जी एक बेटी तथा एक बेटे की शादी कर दी थी। जब वो मृत्यु को प्राप्त हुई तब उसकी एक लड़की और एक लड़का कुँवारा था। उसके निधन के बाद मध्यान्ह भोजन उसका लड़का समे श तथा लब़की रोमा करने लगे थे।
पैंतीस वर्ष पूर्व जब शीला की शादी  नंदकिशोर से हुई थी तब नंदकिशोर के पिता हरलाल दस एकड़ सिंचित जमीन के स्वामी थे। अच्छा खाता पीता परिवार था नंदकिशोर भी स॔दर सजीला युवक था। यही सोचकर शीला के पिता ने नंदकिशोर से उसकी शादी कर दी थी। शीला ने ससुराल में आकर देखा तो पता चला कि नंदकिशोर एक धेला भी नहीं कमाता है अपना वक्त ऐसे ही बर्बाद करता रहता था। नंदकिशोर के दो भाई ओर थे जिसमें नंदकिशोर का बड़ा भाई प्रकाश तथा जोटा भाई दिनेश  था।  वो दोनों भाई खूब मन लगाकर खेती करते थे नंदकिशोर छुटभैया नेता भी था इसलिए उसके पिता हरलाल उससे कुछ नहीं कहते थे ।शादी होने के बाद भी नंदकिशोर के रवैये में बिल्कुल फर्क नहीं आया था।  रोज सुब्ह शहर जाना और शाम को शराब के नशे में चूर होकर घर आना  जारी था। आखिर शीला शादी के चंद रोज बीतने के बाद खेतों में काम करने लगी थी। नंदकिशोर ने शीला को कमाकर एक रुपये भी नहीं दिया बल्की  वो ही शीला से कभी कभी रुपया उधार कहकर ले लेता था और फिर  कभी उन पैसों  को वापस नहीं  करता  था। एक दिन हरलाल का डेंगू के बुखार के इलाज में,लापर वाही  के कारण निधन  हुआ था। हरलाल के निधन के बाद  खेती तीन हिस्सों में बँट गई। तीनों के हिस्से में  तीन एकड़ तैंतीस डिस्मिल खेती आई थी। दोनों भाई तो खेती पूरे ध्यान से कर अच्छा मुनाफा ले रसे थे जबकि  नंद किशोर की पत्नी शीला खेती कर  रही थी उसे तो नेतागिरी से ही फुरसत नहीं थी। दो साल खेती  में लगातार नुक्सान होने के कारण तीसरे साल नंदकिशोर ने अपने हिस्से की पूरी जमीन बेच दी थी । उस जमीन से जो रूपये मिले लो नंदकिशोर ने शराब और सिगरेट में  दो साल में  बर्बाद  हो गए थे। अब वे किसान से मजदूर हो गए थे।  सिगरेट का अधिक मात्रा में सेवन करने के कारण सब उसे सिगरेटी कहते थे। शीला के बच्चे छोटे थे वो खूब मेहनत मजूरी करके अपने बच्चों का पेट भर लेती थी। बच्चे बड़े हुए  तो वे भी पढ़ाई के साथ साथ  मजदूरी करने लगे थे।  पूरे इकतीस साल के  वैवाहिक जीवन  में कभी काम चरते नहीं देखा था। नंदकिशोर का उठना बैठना शहर के उन रईसों के बीच था  जो शराब तथा जुआ के शौकीन थे उनसे उसे मुफ्त में शराब  मिल ने लगी थी।जब नंदकिशोर का लीवर पूरी तरह खराब हो गया तब  उसका सब जगह आना जाना बंद हो गया था। नंदकिशोर के निधन होने के बाद  गिने चुने लोग ही  उसके अंतिम संस्कार में   शामिल हुए थे।  चार साल बाद आज शीला ने भी ये दुनिया छोड़ दी थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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