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कहानी: फुरसत में

विवेक श्रीवास्तव जी को चालीस साल की सरकारी नौकरी से रिटायर हुए पूरे पाँच साल हो  गए थे। इन पाँच सालों में अब कहीं वे  अपनी सेवानिवृति को स्वीकार कर पाए थे। शुरू में तो काम के भारी बोझ से जो एकाएक उन्हें फुर्सत मिली उसे वो सहन नहीं कर पाए थे कई दिनों तक उनका मन अशाँत रहा था। श्रीवास्तव  जी एकाउण्टेण्ट के पद से सेवानिवृत्त हुए थे आजकल वे चार्टड एकाउण्टेण्ट रोहित वर्मा के साथ काम कर रहे थे तब से वे अपने आप को बेहतर महसूस करने लगे थे।।
पाँच वर्ष पूर्व जब श्रीवास्तव जी सेवानिवृत्त होने के बाद घर आए थे तो खुश थे कि काम के भारी बोझ से छुटकारा मिला कुछ दिन उनके अच्छे कटे उन रिश्तेदारों से भी मिले जिन्हें ये शिकायत रहती थी कि  वह आते ही नहीं हैं समाज के कार्यक्रम में भी शामिल हुए। लेकिन कब तक यह सब चलता  कुछ दिन बाद उनके पास फुरसत के सिवा और कुछ नहीं था वो फाइल भी नहीं थीं जिन्हेः वे घर लाकर देर रात निबटाते थे यह खाली समय उनका काटे से भी नहीं कट रहा था  एक दिन उनकी इच्छा ऑफिस जाने की हुई ऑफिस गए तो सभी ने उनका स्वागत किया साहब ने उनसे हाथ मिलाया बराबरी से बिठाया ये उन्हें बड़ा अटपटा लगा उनके लिए जो चाय मँगाई गई उसका स्वाद  उन्हें बहुत अच्छा लगा उन्होंने चपरासी मुकेश से  कहा आजकल चायवाला अच्छी चाय  बनाने लगा है। मुकेश बोला चाय तो वही है लेकिन चार महीने से आप घर की बनी चाय पी रहे हैं। इसलिए आपको यह चाय अच्छी लग रही है। श्रीवास्तव जी को पिछली याद ताजा हो गईं बोले एक समय वो भी था जब दिन भर में पैंतीस चाय तक पी जाते थे । अब तो पत्नी दिन में सिर्फ दो बार चाय देती है ।वो चाय इतनी अच्छी नहीं रहती। जब ऑफिस में थे तब  तो दिन में तीन बार नाश्ता भी कर लेते रिटायरमेन्ट के बाद वो सब बंद हो गया। वो ठाठ बाट रुतबे भी नहीं रहे। मुकेश बोला थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा  मुकेश को साहब ने बुलवा लिया। वे थोड़ी देर तक अकेले बैठे रहे सब अपने अपने कार्य में व्यस्त थे। श्रीवास्तव जी को ऐसे बैठना बड़ा अटपटा लग रहा था पुराने दिनों की याद करते हुए वे घर आ गए  मन ही मन ये तय करते हुए कि अब वे ऑफिस कभी नहीं जाएँगे। थोड़ा बहुत उन्हें एकाउण्ट का काम मिल जाता  वो करके उन्हें संतोष मिलता था सुब्ह शाम वे  मंदिर और पार्क जाने लगे थे जहाँ उनके जैसे और साथी भी आते थे धीरे धीरे उनका ग्रुप बन गया सब अपनी बातें साझा करते। श्रीवास्तव जी का भी थोड़ मन बहल जाता था  तभी एक दिन वे  चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट रोहित वर्मा के  ऑफिस गए उनका एक सहयोगी नहीं आया था और काम बहुत सा पड़ा था श्रीवास्तव जी ने सहयोग देने की इच्छा प्रकट की  रोहित जी ने उन्हें कुछ काम  सौंपा जब वो काम उन्होंने अच्छे से कर दिया तो रहित जी ने उन्हें और काम दिया रिटायरमेन्ट के डेढ़ साल बाद  उन्होंने पहली बार पूरे पाँच घंटे लगातार काम किया था उन्हें बहुत अच्छा लग रहा था इस बीच उन्हें चार बार चाय भी मिली थी रोहित जी श्रीवास्तव जी के काम से खुश थे। उन्होंने श्रीवास्तव जी को काम पर रख लिया था। उन्हें वेतन से ज्यादा काम प्यारा था। वैसे ही उन्हें अच्छी पैंशन मिल रही थी रोहित जी के यहाँ काम करते हुए उन्हें साढ़े तीन साल हो गए थे। इस काम ने उनकी रिटायर मेन्ट के बाद  मिली उबाई फुरसत से मुक्ति दिला दी थी उनके लिए यही काफी था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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