नारायण सिंह आज अपनी भाभी माँ सुमन की तेरहवीं के कार्यक्रम में शामिल हुए थे ऐसे अवस सभी परिचित अःवं संबंधी उनसे जुड़ संस्मरण सुना रहे थे उनकी बात सुनकर नारायण इतना ही बोले कि मैं उनके बारे म क्या क्या कहूँ वो मेरी आदर्श थीं उनकी बदौलत में अपने जीवन में कुछ करने लायक हुआ। भाभी माँ के निधन का नायण कॅङभो बड़ा दुख था।
नारायण सिंह जब आठ वर्ष के थे तब उनके पिता शिवनारायण का निधन हो गया था। उनके बड़े भाई प्रेमनारायण जी तब आठवीं में पढ़ रहे थे पिता के निधन से घर की आर्थिक स्थिति डगमगा गई थी वो समय उन्नीस सौ पचास का था। प्रेमनारायण जी पढ़ने भें तेज थे लेकिन परीक्षा फीस के दो रुपये उनके पास नहीं थे तो वे परीक्षा नहीं दे सके उनके गाँ में स्वास्थ्य केन्द्र खुला था उसमें उनके ताऊ जी के लड़के तेजनाराय ने उन्हें चपरासी की नौकरी दिलवा री थी इसके बाद उनकी शादी सुमन से हो गई। सुभन ने जोर देकर नारायण का स्कूल में एडमीशन कराया। एक बार प्रेमनारायण जी की नौकरी को लेकर उनकी ताई ने ऐसी बात कह दी जो उन्हें चुभ गई उन्होंने कहा मेरे बेटे ने नौकरी लगवा दी तो अच्छे से रह रहे हो नहीं तो कहीं भीख माँग रहे होते। प्रेम नारायण जी को ये सहन नहीं हुआ जिला मुख्यालय पर पुलिस की भर्ती हो रही थी वे उसमें चले गए वहाँ उनका चयन हो गया। वेजब गाँव पहुँचे तो पुलिस की वर्दी में थे। चपरासी की नौकरी उन्होंने उनसे छोटे भाई प्रताप नारायण को दिलवा दी। गाँव में माँ सरोज रह रही थीं जो मजदूरी करतीं थीं बड्रे भाई के नौकरी पर बाहर चले जाने से नारायण निरंकुश हो गए थे। स्कूल जाना उन्होंने छोड़ दिया था भाभी सुमन जब गाँव आई तो नारायण के शिक्षक मोहन सिंह ने बताया कि नारायण पे तो स्कूल आना ही छोड़ दिया है। सुनकर सुमन भाभी को बड़ा दुख हुआ उन्होंने नारायण के बड़े भैया से बात की और नारायण को अपने साथ ले आईं वे सब सरकारी क्वार्टर में रह रहे थे। नारायण का नए सिरे से एडमीशन कराया गया सुमन भाभी ने उन्हें ऊपने बेटे की तरह रखा। उनको पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया। सुमन भाभी के कारण वे दसवीं की परीक्षा पास कर सके। नारायण अब भाई पर बोझ नहीं बनना चाहते थे। भाई के भी तीन बच्चे हो गए थे तनखा इतनी अच्छी नहीं थी फिर भी सुमन ग्यारहवीं में उन्हें पढ़ाना चाहती थीं।पर नारायण सिह ने नौकरी तलाश करना शुरू कर दी थी। उनके दोस्त के साथ वे शहर में गए । वहाँ वे पटवारी बन गए। भाभी माँ ने उनकी शादी करा दी । भाभी माँ ने उन्हें आगे प्राइवेट फार्म भरकर पढ़ाया डिससे वे पटवारी से नायब तहलीदार बन गए थे। नायब तहसील दार के पद से उन्हें रिदायर हुएआठ साल हो गया था । अब उनका भरापूरा परिवार था और सब सुखपूर्वक रह रहे थे ।इसमें भाभी माँ का
बडा योगदान थाथ
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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