सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: लडके ने मकान बिकवाया

सूरज सिंह कभी पाँच एकड़ जमीन के स्वामी थे पक्का घर था घर में आटा चक्की लगी हुई थी अच्छा कमाते खाते थे लेकिन उनके इकलौते लड़के  रवीन्द्र ने अपने गलत निर्णय के कारण उन्हें मिटा दिया था उनका मकान बिक गया जमीन बिक गई थी। आजकल वे एक किराये के मकान में रहकर चक्की चलाकर अपनी गुजर बसर कर रहे थे। लड़की रजनी की शादी वे चार साल पहले कर चुके थे और वो अपनी ससुराल में खुश थी। रवीन्द्र उनकी बर्बादी का कारण बनने के बाद  उन्हें छोड़कर अपनी पत्नी सुनीता तथा दोनों बच्चे सुनील तथा संगीता को लेकर दूसरे शहर में रहने चला गया था।
सूरज सिंह  अकेले खजूरी कला गाँव में अपनी पत्नी शीला के साथ रह रहे थे उनकी उम्र साठ वर्ष की हो गई थी। आज वे बड़े दुखी थे दिन में दस बार  उन्होंने रवीन्द्र को फोन लगाया था। उन्हें पैसे की जरूरत थी रवीन्द्र को यह बात मालूम थी इसलिए वो फोन नहीं उठा रहा था।  रकम के नाम पर शीला के गले में सोने का मंगल सूत्र बचा था उसके भी बिकने की नौबत आ गई थी।
बर्बादी की शुरूआत दो साल पहले हुई थी  तब सूरज सिंह का लड़का एक निजी यात्री बस में कंडक्टर था।  यह काम करते हुए उसे दस साल हो गए थे उसका एक ही सपना था कि वह बस मालिक बने जब उसे पता चला की एक बावन सीटर बस बिक रही है दो साल चली हुई मात्र पन्द्रह लाख रुपये में तो उसे अपना सपना पूरा होता दिखाई दिया। उसके पास तो इतने रुपये थे नहीं जो तनख्वाह मिलती थी उसमें परिवार का गुजारा ही मुश्किल से होता था। वो अपने पिता सूरज सिंह के पास गया और इस संबंध में उनसे बात की उन्हें खूब सब्जबाग दिखाए  सूरजसिंह लडके की बातों में  इसलिए आ गए क्योंकि उनकी पत्नी शीला भी रवीन्द्र का ही पक्ष ले रही थी।  रवीन्द्र ने कहा पच्चीस लाख रुपये की जरूरत पड़ेगी  पन्द्रह लाख की बस आएगी और दस लाख रुपये लाइन लेने तथा और भी कई ऊपरी खर्च में लग जाएँगे। बस पापा साल भर की तो बात है सालभर में बस से इतनी कमाई हो जाएगी की हम इससे ज्यादा पैसे इकठ्ठे कर लेंगे। फिर आपको बुढ़ापे में चक्की चलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी सेठ बनकर रहना।  सूरज सिंह ने मकान  बेचा सात लाख रूपये में और जमीन पच्चीस लाख रुपये भें बेच दी । पच्चीस लाख रुपये उन्होंने रविन्द्र को  दे रिए रवीन्द्र बस ले आया  बस में  दो लाख रुपये खर्च करना पड़े तब कहीं बस ठीक हुई बस दो महीने घर पर ही खड़ी रही लाइन नहीं मिल रही थी दो महीने बाद लाइन मिली भी  तो सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में जिसका अधिकाँश  रास्ता कच्चा था। तीन दिन तक तो वो बस ठीक ठाक चली सवारियाँ भी खूब मिली पर चौथे दिन ड्राइवर ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर बस सँभाल नहीं पाया बस पल्टी खा गई। जान माल का नुक्सान हुआ बस छॆ महीने थाने में खड़ी रही जब छूटी तो बारिश प्रारंभ हो गई रास्ता बहुत खराब हो गया बस दुर्घटना ग्रस्त थी इसलिए उसे  ठीक  कराने में भी पैसा लग गया।  उस बस ने सूरज सिंह को पूरी तरह केगाल कर दिया था आखिर जो बस   उसने पन्द्रह लाख में खरीदी थी वो उसे पाँच लाख में बेचना पड़ी  जो पाँच लाख रुपये मिले वो भी कर्ज अदा करने में चले गए । सूरजसिंह रवीन्द्र से कुछ कहते तो शीला रोक देती जवान लडका है  कहीं कुछ कर बैठा तो। आखिर एक दिन रवीन्द्र ने कहा पापा  मैंने फिर से कंडेक्टर की नौकरी कर,ली है बारह हजार रुपये वेतन है ।  ठीक है और वो दूसरे दिन ही  अपनी पत्नी तथा बच्चों को लेकर  दूसरे शहर चला गया। अब सूरजसिंह के पास सिवाय बेबसी के कुछ नहीं बचा था। सोच रहे थे अभी तो बुढापे की शुरूआत हुई है।  आगे क्या होगा जब हाथ  पैर नहीं चलेंगे।बुढ़ापे में उन्हें घोर गरीबी के दिन देखना पड़ रहे थे।
***,,***
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...