अपनी मम्मी के द्वारा बहू बेटी के साथ भेदभाव से परेशान होकर घर से अलग हुए नरेन्द्र को पाँच साल हो गए थे अब उसका बेटा प्रतीक स्कूल जाने लगा था इन पाँच सालों में नरेन्द्र ने शून्य से शुरुआत कर शिखर को छुआ था। उसकी पत्नी निर्मला भी काफी ख़ुश रहा करती थी निर्मला संयुक्त परिवार में डेढ़ साल रही थी।इन डेढ़ सालों में उसके साथ जो यातनाजनक बर्ताव हुआ था उसे जो सुने उसके सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँ।
निर्मला सुंदर सुशील सीधी सरल और पढ़ी लिखी थी जब उसकी नरेन्द्र से शादी हुई तब नरेन्द्र की बहन नीता कुँवारी थी वह भी विवाह योग्य थी छोटा भाई नितेश कॉलेज में पढ़ रहा था। नरेन्द्र की मम्मी निकिता एक अहंकारी महिला थी । नरेन्द्र के पिता सुजान सिंह घर के मामलों में दखल नहीं देते थे परिवार की आय का साधन किराने की दुकान थो जो अच्छी चलती थी नरेन्द्र ही दुकान चलाता था पिता और भाई तो बहुत कम दुकान पर ध्यान देते थे नरेन्द् एक ईमानदार इंसान था जिससे घर का खर्च आराम से चल रहा था। निर्मला से शादी होने के बाद नरेन्द्र बहुत खुश था। उसकी ये खुशी उसकी माँ निकिता और बहन नीता बर्दाश्त नहीं कर पा रहीं थीं।
उनका बर्ताव निर्मला के प्रति खराब होता जा रहा था। एक दिन नरेन्द्र ने देखा कि निर्मला के गले में सिर्फ मंगल सूत्र बचा है नरेन्द्र ने पूछा बाकी जेवर कहाँ है वो बोली मम्मी ने ले लिए। जबकि शादी में जो सात तौला सोपे के जेवर उन्होंने निर्मला को दिए थे वे पहले ही रख लिए थे। ये पाँच तौला सोने के जेवर वो मायके से लाई थी वो भी उसकी मम्मी ने हड़प लिए थे। एक एक कर निर्मला की सारी अच्छी और कीमती साड़ियाँ नरेन्द्र की मम्मी और बहन ने साजिश कर हडप ली थीं अब निर्मला के पास साधारण सस्ती साड़ियाँ बची थीं निर्मला जो दहेज लाई थी उस पर भी सास ने कब्जा जमा लिया था अब उस घर में निर्मला की हैसियत नौकरानी से भी बदतर थी। नरेन्द्र ये सोचकर चुप था कि उसकी बहन की शादी होना थी। जबकि परिवार का खर्च उसकी कमाई से ही चल रहा था। आखिर नीता की शादी तय हो गई शादी में निर्मला कोल्हू के बैल की तरह काम करती रही उसकी सास ने उसका सारा दहेज कपड़े बर्तन और अन्य सामान अपनी बेटी को विवाह में दे दिया जो पाँच तौला सोना निर्मला मायके से लाई थी। वो भी निकिता ने बेटी को दे दिया था। नीता की शादी के बाद भी निर्मला की मुश्किलें कम नहीं हुई नीता का पति आकाश निठल्ला था नीता अपने पति आकाश के साथ अक्सर मायके में ही जमी रहती निर्मला उनकी सेवा कर के परेशान हो जाती। नीता और निर्मला दोनों ही गर्भवती थीं लेकिन नीता का विशेष ख्याल रखा जा रहा था और निर्मला को भर पेट भोजन भी नहीं मिल रहा था नरेन्द्र ने देखा कि जब नीता ने सोमवार का व्रत किया तो उसकी मम्मी ने उसे दिन भर फलाहार कराया बादाम का हलुआ काजू की बर्फी और मँहगे से मँहगे फल दिए । और जब निर्मला ने ग्यारस का व्रत किया तो उसे दिन भर भूखा रखा शाम को थोड़े से साबूदाने देकर कहा इसकी खिचड़ी बनाकर खा ले। नरेन्द्र के मन में अब अपनी माँ तथा बहन के प्रति नफ़रत पैदा होने लगी थी। निर्मला के मायके से जो फल मेवे आते वे सब नीता को दे दिए जाते। निर्मला भी गर्भवती थी डॉक्टर ने उसे कमजोर बताया था उसे टॉनिक लिखकर दिए पर सास ने उसे वो भी लाकर नहीं दिए। नरेन्द्र ने लाकर दिए भी तो नीता का पति उसे वापस मेडिकल स्टोर पर दे आया और उन पैसों को शराब में उड़ा दिया नरेन्द्र ने डिलेवरी के समय के लिए पाँच किलो शुद्ध देसी घी लाकर रखा था जबकिआकाश जो घी लाया था वो बहुत पुराना बदबूदार था वो सस्ता था तथा कहीं से खाने योग्य नहीं था लड्डू के लिए जो मेवा तथा गुड़ व अन्य सामग्री निर्मला के मायके से आई थीं। वो निकिता ने नीता के लिए रख लीं थीं और आकाश जो घटिया सस्ती सामग्री लाया था। वो निर्मला को देने का भन निकिता ने बना लिया था। पानी तो जब सिर से पार हो गया जब नरेन्द्र ने डिलेवरी के लिए अस्पताल में जमा करने के लिए जो डेढ़ लाख रुपये दिए उसमें सिर्फ निकिता ने नीता के लिए जमा कराए। जब नरेन्द्र ने माँ से कहा तो वो बोली ज्यादा जोरू का गुलाभ मत बन मैंने दाई से बात कर ली है निर्मला की डिलेवरी घर पर ही हो जाएगी। नरेन्द्र बोला माँ उसकी जान को खतरा है अगर कुछ हो गया तो इस पर निकिता कुटिलता से बोली कुछ नहीं होगा और अगर मर भी गई तो लड़कियों की कमी थोड़ी है तेरी दूसरी शादी करा दूँगी। नरेन्द्र अच्छी तरह समझ गया था कि अगर उसने यहाँ निर्मला की डिलेवरी कराई तो वह न निर्मला को बचा पाएगा न अपने बच्चे को उसने कड़ा निर्णय लिया। वो फौरन निर्मला को लेकर घर से अलग हो गया निकिता ने सब कुछ छीन लिया था उसके पिता ने नरेन्द्र की दुकान पर कब्जा जमा लिया था। निकिता ने कह दिया था अब कभी अपनी मनहूस सूरत मत दिखाना। नरेन्द्र और निर्मला जब घर से निकले तो जो कपड़े वे पहने हुए थे उनके सिवा उनके पास कुछ नहीं था। नरेन्द्र के मित्र अशीक ने किराये के मकान की व्यवस्था की और एक लाख रुपये नरेन्द्र को उधार देकर घर गृहस्थी का सामान दिलाया। नरेन्द्र परेशान था निर्मला की हालत खराब थी उसे सात माह का गर्भ था और वो कुपोषण की शिकार थी। नरेन्द् ने जब उसकी शादी हुई थी तब ससुराल से उसे नेग में पचास हजार रुपये मिले थे। वे उसने अपने मित्र उमेश को दे दिए थे जो शेयर ब्रोकर था। उसने वे रुपये शेयर मार्केट में लगा धिए थे। नरेन्द्र ने विचार किया कि वो उमेश से मिलकर बात करे और जो पैसे मिले उससे पत्नी का इलाज कराए वो उमेश कै पास गया और जब पता किया कि कितने रुपये मिलना हृ ए तो उमेश का जवाब सुनकर उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उमेश ने कहा उसके पूरे बाइस लाख रुपये हो गए हैं जिसमें
दो लाख रुपये के शेयर उसने परसों ही नरेन्द्र के नाम से लिए हैं बाकी बीस लाख रुपये मिल जाएँगे। नरेन्द्र ने उमेश को अपनी स्थिति से अवगत कराया उमेश ने शाम को नरेन्द्र को इक्कीस लाख रुपये दे दिए कहा दिन में शेयरों में उछाल आया उससे ये एक लाख रुपये और बढ़ गए। नरेन्दू वो रुपये लेकर आया एक लाख रुपये देकर अशोक की उधारी चुकता की निर्मला को ले अस्पताल पहुँचा निर्मला का चेकअप प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ नीरजा ने किया और वे नरेन्द्र पर बरस पड़ीं कुछ दिन और नहीं लाते तो इन्हें कोई बचा नहीं सकता था उन्होंने फौरन निर्मला को अस्पताल में भर्ती कर इलाज शुरू कर दिया निर्मला दो महीने डॉ नीरजा की देखरेख में रही जिसकी वजह से उसे नार्मल डिलेवरी हुई थी निर्मला ने बेटे को जन्म दिया था उसका नाम उन्होंने प्रतीक रखा था । बेटा भागयशाली सिद्ध हुआ अस्पताल का बिल सात लाख आया था जिसमें डॉक्टर नीरजा ने दो लाख की छूट दिलवा दी थी वे निर्मला को बेटी मानने लगी थीं। नरेन्द्र ने पन्द्रह लाख रुपये से बिल्डिंग मटेरियल की दुकान खोल ली थी दुकान चल निकली जिससे नरेन्द्र को बहुत लाभ हुआ पाँच सालों में नरेन्द्र शहर का प्रमुख व्यवसायी बन गया था। दूसरी और खोटे कर्मों की सजा अवश्य मिलती है ये भी नरेन्द्र ने देख लिया था। उसे घर से अलग करने के बाद उसकै पिता दुकान को सम्हाल नहीं पाए दामाद आकाश ने उन्हें खूब चूना लगाया अच्छी भली चलती दुकान का भट्टा बिठा दिया। उन्हें सड़क पर ला दिया नीता ने लड़की को जन्म दिया था। जब घर में पैसे की तंगी हुई तो आकाश ने नीता को लेकर ससुराल हमेशा के लिए छोड़ दी नितेश की पढ़ाई छूट गई दुकान का किराया नहीं देने से दुकान खाली करना पड़ी दुकान में अब कुछ बचा भी नहीं था। नितेश अब ठेला पर सामान रखकर फेरी लगाकर बहुत थोड़े पैसे कमा रहा था पिता कमजोर होने से घर पर ही रहने लगे थे काजू बादाम से नाश्ता करने वाली निकिता को सूखी रोटी के भी लाले पड रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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