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कहानी: नपाध्यक्ष

सतीश नागर लगातार चौथी बार बड़ागाँव नगर पालिका के अध्यक्ष चुने गए थे जबकि इस चुनाव में उनके विरोधी दिनेश बड़कुल ने पानी की तरह पैसा बहाया था फिर भी उसकी करारी हार हुई। दुष्प्रचार, झूठी अफवाह का भी कोई लाभ नहीं हुआ था। श्री नागर फिर भी भारी बहुमत से जीत गए थे। सतीश नागर तीस साल पहले जब बड़ागाँव में ग्राम पंचायत सचिव थे तब उन्हें अपनी ईमानदारी के कारण नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। इसकी लोगों में बड़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी जिसने उन्हें जनता में लोकप्रिय बना दिया था। तीस साल पहले बड़ागाँव अंचल का सबसे बड़ा गाँव था जिसकी जनसंख्या आठ हज़ार थी। उस समय सतीश नागर पंचायत के सचिव थे तथा मदनलाल नवनिर्वाचित सरपंच। उस समय मदनलाल को लोगों ने इसलिए वोट दिया था क्योंकि वो जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गए थे कि वो ईमानदार हैं और अपने पद पर ईमानदारी से काम करेंगे। पर जीतने के बाद मदनलाल के तेवर बदल गए थे। इससे सतीश नागर जो एक ईमानदार सचिव थे पशोपेश में पड़ गए थे कि वे किसका साथ दें। मदनलाल ने पदभार ग्रहण करने के बाद ही भ्रष्टाचार की शुरूआत कर दी थी। गाँव में नाली का निर्माण हो रहा था उसके ठ...

कहानी: दुख में न कोई

रामस्वरूप का एक्सीडेन्ट हुए पूरे आठ माह हो गए थे लेकिन अब भी वो पूरी तरह से चल फिर नहीं सकता था। ट्राइसायकिल से अपनी गुमठी पर जाता और दिन भर वहीं रहता जो भी बिक्री होती उससे बमुश्किल अपनी गुजर बसर कर रहा था। जबकि वो एक हार्ट पेशेन्ट के साथ साथ डायबिटीज का मरीज भी था। जिनके कारण उसका एक्सीडैन्ट हुआ था उन्होंने तो खोज ख़बर तक नहीं ली थी। उसकी पत्नी सरला अब पछता रही थी अगर उसने पहले यह सोच लिया होता तो वो कभी ऐसी गलती नहीं करती। आठ माह पहले की बात है जब रामस्वरूप एक कारखाने में सुपरवायजर था। उसे अच्छी तनख्वाह मिल रही थी बड़ा लड़का नीरज एक कंपनी में नौकरी कर रहा था और वो जयपुर में अपनी पत्नी निर्मला के साथ रह रहा था। बेटी विमला की शादी भी हो गई थी और वो अपने ससुराल में थी। रामस्वरूप के साले रवि की शादी हो रही थी साले की पत्नी पलक उसके घर शादी का निमंत्रण देने आई तो रामस्वरूप से बोली शादी मैं आपको जरूर आना है रामस्वरूप बोले मैं रात को कहीं आता जाता नहीं हूँ। मेरी दोनों आँखों में मोतियाबिंद है। रात में मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता। इस पर वह बोली आना तो आपको पड़ेगा ही चाहे कैसी भी आओ अगर नहीं ...

कहानी: बाल मेला

रतनपुर की कन्या माध्यमिक शाला में पहली से आठवीं तक छात्र संख्या कुल पचपन होने के बाद भी बाल मेला का आयोजन सफल रहा था सभी ब्च्चे खुश थे प्रधानाथ्यापक आर के वर्मा भी संतोष का अनुभव कर रहे थे पिछली साल इस शाला में दो सौ छात्र छात्रा अध्ययनरत थे नौ शिक्षक कार्यरत थे तब भी बाल मेला इतना सफल नहीं रहा था जितना सफल,आज का आयोजन हुआ था। पिछले साल रतनपुर का हायर सेकेणडरी स्कूल सी एम राइज स्कूल बन गया था रतनपुर की बालक माध्यमिक शाला को सी एम राइज में मर्ज कर दिया गया मगर कन्या माध्यमिक शाला को छोड़ दिया गया फिर भी परिणाम उल्टा ही रहा कन्या शाला के बच्चे बड़ी संख्या में टीसी लेकर सी एम राइज स्कूल में प्रवेशित हो गए जिससे छात्र संख्या तेजो से गिरी कक्षा एक में तो मात्र दो ही एडमीशन हुए थे। कई कक्षाओं में तो दस से भी कम छात्र बचे थे इसके कारण दो मध्यान्ह भोजन बनाने वाले रसोइयों की नौकरी चली गई थी नौ में से चार शिक्षकों का अतिशेष में तबादला हो गया था सी एम राइज के भवन के निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा था भवन बन जाने पर यह स्कूल भी मर्ज होने वाला था। जो शिक्षक कार्यरत थे वे भी यह मानकर चल...

कहानी: जिम्मेदारी

मनोज की उम्र अभी बीस वर्ष की भी नहीं हुई थी और वो परिवार की पूरी जिम्मेदारी निभा रहा था पिछले महीने ही उसने अपनी बड़ी बहन तेइस वषीया सुमन की शादी की थी जिसमें खूब दहेज दिया था मनोज के पिताजी शंकर लाल का निधन डेढ़  वर्ष पूर्व  एक सड़क दुर्घटना में हो गया था था तब मनोज की उम्र अठारह साल की थी ।  उसने इस उम्र में  ही अपने परिवार का सारा बोझ अपने कंधे पर ले लिया था। मनोज के पिता शंकरलाल लोडिंग ऑटो चलाते थे उन्होंने दीपावली पर एक और लोडिंग ऑटो खरीदा था उसका कारण यह था कि मनोज तीन साल से लगातार नवमी कक्षा में फेल हो रहा था चौथे साल उसे स्कूल से निकाल दिया गया था। स्कूल से निकाले जाने से शंकर लाल मनोज पर खूब गुस्सा हुए तो मनोज ने भी कह दिया कि पढ़ना लिखना अपने बस का नहीं है। आप तो हमें  कहीं काम पर लगा दो। शंकरलाल जी को मनोज की बात कुछ जमी  और उन्होंने दीपावली पर एक और लोडिंग ऑटो खरीद लिया तथा एक सप्ताह में मनोज को ऑटो चलाना सिखा दिया । इस पर शंकरलाल बोले कि जब तू एक हफ्ते में अच्छी तरह लोढिंग ऑटो चलाना सीख सकता है तो पढाई में इतना फिसड्डी क्यों है मनोज ने इसका को...

कहानी: टेक्सी ड्राइवर

पिछले साल तक सतीश टेक्सी ड्राइवर था उसे मात्र पन्द्रह हज़ार रुपये वेतन मिल रहा था जिसमें उसके परिवार की गुज्रर बसर मुश्किल से चल रही थी पिछली दीपावली पर उसके मालिक सोहन ने उसके सामने एक प्रस्ताव रखा था जिसमें उसे या तो तीस हज़ार रुपये बोनस लेना था । या फिर उसको डाउन पेमेन्ट मानकर पन्द्रह हज़ार रुपये प्रतिमाह की किश्त पर वही टेक्सी खरीद लेना था जिसका वो ड्राइवर था। सतीश ने मालिक की बात मानकर वो टेक्सी ख़रीद ली जो उसके लिए लाभ का सौदा सिद्ध हुई आज वो उस टेक्सी की किश्त तो अदा कर ही चुका था। बल्कि इस दीपावली पर उसने एक नई टेक्सी भी खरीद ली थी। और इसके साथ ही एक ड्राइवर को भी रोज़गार दे दिया था। सतीश जब टैक्सी ड्राइवर था तब उस की सोच यही थी की टेक्सी मालिक बनना उसके लिए असंभव है उसकी किस्मत में तो ड्राइवरी है पर जब टेक्सी मालिक सोहन ने उसे टेक्सी बेचने की बात कही तब उसने उसे मान तो लिया पर मन में यही डर था कि अगर टेक्सी नहीं चली तो हर महीने की पन्द्रह हज़ार रुपये की किश्त कैसे अदा करेगा और परिवार का खर्च कैसे चलाएगा लेकिन ऐसी कभी नौबत नहीं आई शुरू दिन से ही उसे काम ...

कहानी: पुनर्मिलन

मोहन लाल का अपनी पत्नी राधिका से समझौता होने पर एक साल बाद पुनर्मिलन हुआ था। इस मेल से जहाँ मोहनलाल और राधिका ख़ुश थे वहीं दोनों बच्चे रोहन और सोनम भी बहुत खुश नज़र आ रहे थे। एक छोटे से झगड़े ने इतना तूल पकड़ा कि वे साल भर अलग रहे। बच्चे कभी पिता के यहाँ तो कभी मायके में रहे, साल भर तक उन्हें माता पिता का एक साथ सानिध्य नहीं मिला था। साल भर पहले सिर्फ एक छोटी सी घटना घटी थी। तब मोहनलाल जानपुर जोड़ पर स्थित एक ढाबे पर रात के ग्यारह बजे अपने साले रवि के साथ खाना खा रहा था। रवि के पास टेक्सी थी जिसे वो इंगेज पर चलाता था। जबकि मोहनलाल मिस्त्री का काम करता था। रवि खाने के साथ ही शराब भी पी रहा था। उसने मोहनलाल से भी शराब पीने का आग्रह किया जिसे मोहनलाल ने नकार दिया। फिर रवि ने जिद पकड़ ली की जीजा शराब तो तुम्हें पीनी पड़ेगी। मोहनलाल ने सख्ती से मना कर दिया तो रवि ने गुस्से में आकर शराब की बोतल से गाड़ी के काँच पर जोर से प्रहार किया। इससे टेक्सी का फ्रन्ट का काँच टूट गया और रवि का हाथ भी लहूलुहान हो गया। रवि नशे मे धुत होकर मोहनलाल को गाली देने लगा था। मोहनलाल खुद को संयत कर रवि को गाड़ी...

कहानी: बागवानी छोड़कर

लखन बागवान ने जबसे बागवानी छोड़कर सब्जी फल फूल की दुकान लगाई थी तभी से वो सुखी और संपन्न जीवन जी रहा था। यह दुकान लगाए उसे तीन ही साल हुए थे और इस बीच उसने पक्का मकान भी बना लिया था और इस दीपावली पर नई कार भी खरीद ली थी। जबकि जब वो बागवानी करता था तब कर्ज में ही डूबा रहता था और हमेशा आभावों का जीवन जीता था। इस बार लखनलाल एवं उसके परिवार ने दीपावली का पर्व धूमधाम से मनाया था। लखन बागवान के पास तीन एकड़ जमीन थी जिस पर वह तीन साल पूर्व तक फल, फूल और सब्जी उगाता था। तथा सब्जी मंडी में नीलामी में बेचकर अपना गुजर बसर करता था। एक बार की बात है वो तीन कट्टी हरी मिर्च नीलामी में बेचकर आया था जो बीस रूपये किलो के भाव से बिकी थी। सब्जी मंडी के बाहर उसने उत्सुकतावश फुटकर विक्रेता से हरी मिर्च का भाव पूछा तो उसने बताया ले लो सस्ती ही है सिर्फ दस रुपये कि सौ ग्राम। लखन ने हिसाब जोड़ा यानि सौ रूपये किलो। पाँच गुना अधिक दाम वो भी चंद कदम की दूरी पर जबकि वो अच्छी तरह जानता था कि सब्जी कितनी मेहनत से उगाई जाती है और लागत भी बहुत लगती है मगर दाम कभी अच्छे नहीं मिलते...