रामस्वरूप का एक्सीडेन्ट हुए पूरे आठ माह हो गए थे लेकिन अब भी वो पूरी तरह से चल फिर नहीं सकता था। ट्राइसायकिल से अपनी गुमठी पर जाता और दिन भर वहीं रहता जो भी बिक्री होती उससे बमुश्किल अपनी गुजर बसर कर रहा था। जबकि वो एक हार्ट पेशेन्ट के साथ साथ डायबिटीज का मरीज भी था। जिनके कारण उसका एक्सीडैन्ट हुआ था उन्होंने तो खोज ख़बर तक नहीं ली थी। उसकी पत्नी सरला अब पछता रही थी अगर उसने पहले यह सोच लिया होता तो वो कभी ऐसी गलती नहीं करती।
आठ माह पहले की बात है जब रामस्वरूप एक कारखाने में सुपरवायजर था। उसे अच्छी तनख्वाह मिल रही थी बड़ा लड़का नीरज एक कंपनी में नौकरी कर रहा था और वो जयपुर में अपनी पत्नी निर्मला के साथ रह रहा था। बेटी विमला की शादी भी हो गई थी और वो अपने ससुराल में थी। रामस्वरूप के साले रवि की शादी हो रही थी साले की पत्नी पलक उसके घर शादी का निमंत्रण देने आई तो रामस्वरूप से बोली शादी मैं आपको जरूर आना है रामस्वरूप बोले मैं रात को कहीं आता जाता नहीं हूँ। मेरी दोनों आँखों में मोतियाबिंद है। रात में मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता। इस पर वह बोली आना तो आपको पड़ेगा ही चाहे कैसी भी आओ अगर नहीं आओगे तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा। वो तो यह कहकर चली गई तब उसने अपनी पत्नी सरला से कहा तुम्हारा क्या कहना है तो वो बोली इसमें कहने की क्या बात है मेरे भतीजे की शादी है तो जाना तो पड़ेगा। फिर बोली तुम्हारे भतीजे की शादी होती तो तुम नहीं जाते क्या? इस बात पर उन दोनों में कुछ तीखी बहस हो गई फिर बोली इतने भी कमजोर नहीं हो अगर कमजोर होते तो नौकरी कैसे कर रहे होते। अब रामस्वरूप क्या जवाब देता चुप होकर रह गया। उसके कारखाने में काम अधिक होने के कारण उसे छुट्टी नहीं मिली थी। जिस दिन मंडप था उस दिन उसकी पत्नी सरला तो रामस्वरूप का टिफिन तैयार कर शादी में चली गई इधर रामस्वरूप अपनी मोटरसायकिल से कारखाने में आ गया। शाम को कारखाने से जब बाहर निकला तो सीधे अपने घर पहुँचा। उसे तैज चक्कर आ रहे थे दिमाग भन्ना रहा था। उसने पत्नी को फोन लगाया तो वो उल्टे उसी पर झल्ला पड़ी बोली मैं कुछ सुनना नहीं चाहती फौरन आ जाओ भैया भाभी नाराज हो रहे हैं। बेचारा रामस्वरूप उसने जैसे तैसे हिम्मत जुटाई और चल दिया। आगे ट्राफिक जाम हो रहा था उसमें वो एक घंटा फँसा रहा। आखिर जब वो पहुँचा तो किसी ने उससे अच्छा व्यवहार नहीं किया उसकी पत्नी भी मुँह फुलाए बैठी रही। शादी की जो रस्में उससे कराना थी वो भतीज दामाद से कराई जा रही थीं। उसकी घोर उपेक्षा हो रही थी उससे ठीक से बैठा भी नहीं जा रहा था। वो अपमान कब तक बर्दाश्त करता एक तो दोनों आँखों में मोतियाबिंद दूसरे हार्ट पेशेन्ट तीसरे शुगर का मरीज और चौथा भूख से व्याकुल। उसने कहा जब मेरी यहाँ कोई जरूरत ही नहीं है तो मैं यहाँ से जा रहा हूँ। इस पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। ना ही किसी ने उससे यह पूछा कि खाना खाया कि नहीं। वो दुखी होकर लौट रहा था कि आगे एक सुनसान जगह पर उसका एक्सीडेन्ट हो गया। एक कार वाला उसे टक्कर मारकर निकल गया। वो मोटरसायकिल से गिरा और गिरते ही बेहोश हो गया। दो घंटे तक वो घायल अवस्था में वहीं पड़ा रहा सब समझे कि वो मर गया है किसी ने भी गाड़ी रोककर उसे नहीं देखा। रात को दो बजे जब पुलिस की गाड़ी गश्त करते हुए वहाँ से निकली तब उसमें से पुलिस वाले उतरकर आए। उसने हेलमेट पहना हुआ था इसलिए सर में तो चोट नहीं लगी थी मगर हाथ पैरों में फ्रेक्चर हो गया था। पुलिस ने उसे अस्पताल में भरती कराया था। पुलिस का फोन रात को तीन बजे सरला के मोबाइल पर आया। पुलिस ने कहा कि रामस्वरूप का एक्सीडेन्ट हो गया है आप फौरन अस्पताल पहुँचिए। यह सुनकर सरला घबरा गई वो भैया के पास पहुँची और उनसे बोली की उनका एक्सीडेन्ट हो गया है तो भैया बोले देख नहीं रही हो यहाँ शादी का कार्यक्रम चल रहा है ऐसा करो तुम चली जाओ।सरला भैया का यह व्यवहार देखकर बहुत दुखी हुई। यह वही भैया है जो अपनी साली की तो खूब चापलूसी करता है और उसकी इस भारी विपदा में उसका साथ नहीं दे रहा है। सरला जब अस्पताल पहुँची तब सुबह के पाँच बज रहे थे। रामस्वरूप को इस हाल में देखकर उसे रोना आ गया।उसके भैया भाभी उसे एक बार भी देखने नहीं आए ना ही उसका हालचाल पूछा। सरला सोच रही थी जब उसका लड़का ही अपने पिता को देखने नहीं आया तो यह तो भैया भाभी हैं। सरला को अब पता चला था कि दुख में कोई साथी नहीं होता है। इन आठ महीनों में उसकी सारी जमा पूँजी खर्च हो गई थी। प्लॉट बिक गया था जेवर के नाम पर कुछ भी नहीं बचा था। कोई हाल चाल पूछने यह सोच कर नहीं आता था कि कहीं यह हमसे पैसे न माँग ले। रामस्वरूप अस्पताल से घर तो आ गया था लेकिन ठीक से चल नहीं पा रहा था। उसका बायाँ हाथ टेढ़ा हो गया था व सीधा हाथ काम कर रहा था। विकलाँग शिविर में उसे ट्रायसायकिल मिल गई थी। उसी में स्नेक्स बिस्किट और सिंगदाना रखकर वो दिन भर बेचता था। शाम को जब वो कुछ रुपये कमाकर लाता तब उसकी पत्नी आटा सामान लाती तब कहीं उनका चूल्हा जलता और वे देर रात को खाना खाते। सुबह रात का बचा खाना नाश्ते में खाकर रामस्वरूप सामान रखकर बेचने निकल पड़ता। एक दिन रामस्वरूप को उसका साथी राकेश मिला उसने बताया अगर पचास हजार रुपये हों तो मैं तुम्हें एक गुमठी जगह सहित दिलवा सकता हूँ जिसमें तुम अपनी दुकान लगा सकते हो। राम स्वरूप बोला देखो मैं सोचकर जवाब दूँगा। देर शाम जब रामस्वरूप घर आया तो सरला ने कहा कि आपकी बीस वर्ष पहले गुम हुई सोने की एक तौला की अँगूठी आज मिल गई चूहे ने एक जगह बिल बनाया था मैं उस बिल में निकाली हुई मिट्टी भर रही थी तो उसी मैं आपकी यह अंगूठी दिखाई दी। रामस्वरूप बोला लगता है भगवान भी हमारा साथ दे रहे हैं। दूसरे दिन रामस्वरूप ने अपनी वो सोने की अंगूठी बेच दी और उससे यह गुमठी ले ली जो अब उसकी कमाई का एकमात्र जरिया बन गई थी। सरला कभी कभी उस घड़ी को खूब कोसती थी जब उसने अपने पति को शादी में आने के लिए दबाव डाला था।
जिनका लिहाज उसने किया था वे सब बेमुरब्बत निकले जो उसके दुख में बिल्कुल काम नहीं आए थे, उन्होंने तो रिश्ता तक खत्म कर लिया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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