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कहानी: जिम्मेदारी

मनोज की उम्र अभी बीस वर्ष की भी नहीं हुई थी और वो परिवार की पूरी जिम्मेदारी निभा रहा था पिछले महीने ही उसने अपनी बड़ी बहन तेइस वषीया सुमन की शादी की थी जिसमें खूब दहेज दिया था मनोज के पिताजी शंकर लाल का निधन डेढ़  वर्ष पूर्व  एक सड़क दुर्घटना में हो गया था था तब मनोज की उम्र अठारह साल की थी ।  उसने इस उम्र में  ही अपने परिवार का सारा बोझ अपने कंधे पर ले लिया था।
मनोज के पिता शंकरलाल लोडिंग ऑटो चलाते थे उन्होंने दीपावली पर एक और लोडिंग ऑटो खरीदा था उसका कारण यह था कि मनोज तीन साल से लगातार नवमी कक्षा में फेल हो रहा था चौथे साल उसे स्कूल से निकाल दिया गया था। स्कूल से निकाले जाने से शंकर लाल मनोज पर खूब गुस्सा हुए तो मनोज ने भी कह दिया कि पढ़ना लिखना अपने बस का नहीं है। आप तो हमें  कहीं काम पर लगा दो। शंकरलाल जी को मनोज की बात कुछ जमी  और उन्होंने दीपावली पर एक और लोडिंग ऑटो खरीद लिया तथा एक सप्ताह में मनोज को ऑटो चलाना सिखा दिया । इस पर शंकरलाल बोले कि जब तू एक हफ्ते में अच्छी तरह लोढिंग ऑटो चलाना सीख सकता है तो पढाई में इतना फिसड्डी क्यों है मनोज ने इसका कोई जवाब नहीं दिया । इसके बाद मनोज ने भी ऑटो चलाना शुरू कर दिया था अभी उसे  लोडिंज ऑटो चलाते  हुए सिर्फ दो दैन ही हुए थे कि  रात को तीन बजे  पुलिस का फोन आया  पुलिस ने फोन पर बताया कि शंकरलाल का एक्सीडेन्ट हो गया है सीधे सरकारी अस्पताल आ जाओ। यह सब घबराते हुए जब अस्पताल पहुँचे तो  पता चला कि  उनकी मृत्यू तो ऑन स्पॉट ही हो गई थी शंकर,लाल जी का एक्सीडेन्ट हाई वे पर नहीं हुआ था वे  नगर से बारह किलोमीटर दंर स्थित ग्राम खजूरिया में लोडिंग ऑटो माल भरकर लाए थे माल खाली कर के वे वापस लौट रहे थे रात के बारह बज रहे थे । तभी यह दुर्घटना हुई  जिस वाहन ने उन्हें टक्कर मारी उसका पता नहीं चल सका लेकिन इससे लोडिंग ऑटो पलटकर  पुल के नीचे पन्द्रह फीट गहराई में गिर गया था । पूरे एक घंटे तक वो  ऐसे ही पड़ा रहा रात के एक बजे कीसी ने पुलिस को सूचना दी तब पुलिस आई तथा उसे अस्पताल ले गई जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया मनोज ने अपने पिता की मृत देह देखी तो  उसे चक्कर आ गए उसकी मम्मी पछाड़ खाकर गिर पड़ी  मनोज की बहन सुमन 
रोने लगी।  सुब्ह पोस्ट मार्टम के बाद  दिन के ग्यारह बजे मनोज ने श्मशान  में पिताजी की मृत देह का दाह संस्कार कर दिया।  शंकर लाल के अंतिम संस्कार में बहुत लोग  शामिल थे पिताडी की तेरहवीं तक घर में रिश्तेदार रहे लोगों का  आना जाना लगा रहा सब उसे खूब दिलासा देते रहे कइयों ने हर संभव मदद करने का आश्वासन दिया  लेकिन तेरहवीं के बाद सारे  बंधु बांधव और रिश्तेदार चले गए फिर किसी ने उन्हें मुड़कर भी नहीं देखा कि वे किस हाल में रह रहे हैं ।  शंकरलाल जी का लोडिंग ऑटो तो बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था जो  थाने में खड़ा था।  पिताजी ने जो नया ऑटो खरीदा था  उसे लेकर जब मनोज काम पर जाने लगा तो उसकी मम्मी ममता की आँखों में आँसू आ गए वे बोलीं बेटा मत जा हम ये लोडिंग ऑटो बेच देंगे ओर कोई दूसरा काम धंधा कर के अपना  जीवन यापन कर लेंगे पर मनोज नहीं माना तथा लोडिंग ऑटो लेकर चला गया  फिर  रात को साढ़े आठ बजे  घर आया तब ममता की जान में जान आई। धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो गया  पिताजी की कमी तो कोई पूरा नहीं कर सकता था  मगर मनोज ने घर की व्यवस्था अच्छी तरह सँभाल ली थी। शंकरलाल ने  अपने जीवित रहते इतना बड़ा घर बनवा लिया था जिसमें उसके परिवार के साथ तीन किरायेदार भी रह रहे थे।  घर में नगद धन राशि की कमी थी  पर प्रापर्टी खूब थी  वो परिवार को  अच्छी संपत्ति देकर गया था। जबकि शंकर लाल इस शहर में अपने गाँव बिशन खेड़ा से आया था  तब मनोज गोद में था और  उसकी बहन सुमन  पाँच साल  की थी  शंकरलाल ने किराये से मकान ले लिया था  तथा ठेले पर सब्जी रखकर बेचना शुरू किया था।  शंकर लाल ने हर तरह का काम धंधा  किया था । और  पाइ पाइ जोड़कर कुछ रुपये इकठ्ठे किए थे।  जिस से लोडिंग  ऑटो खरीदा था।  शंकर लाल ने अनथक श्रम करके  परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत की थी।  और अंत में दुर्घटना से दुनिया छोड़कर चला गया था।  तभी से मनोज लोडिंग ऑटो चला रहा था । जिसकी कमाई से वो अपनी बड़ी बहन की शादी संपन्न करा सका था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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