मोहन लाल का अपनी पत्नी राधिका से समझौता होने पर एक साल बाद पुनर्मिलन हुआ था। इस मेल से जहाँ मोहनलाल और राधिका ख़ुश थे वहीं दोनों बच्चे रोहन और सोनम भी बहुत खुश नज़र आ रहे थे। एक छोटे से झगड़े ने इतना तूल पकड़ा कि वे साल भर अलग रहे। बच्चे कभी पिता के यहाँ तो कभी मायके में रहे, साल भर तक उन्हें माता पिता का एक साथ सानिध्य नहीं मिला था।
साल भर पहले सिर्फ एक छोटी सी घटना घटी थी। तब मोहनलाल जानपुर जोड़ पर स्थित एक ढाबे पर रात के ग्यारह बजे अपने साले रवि के साथ खाना खा रहा था। रवि के पास टेक्सी थी जिसे वो इंगेज पर चलाता था। जबकि मोहनलाल मिस्त्री का काम करता था। रवि खाने के साथ ही शराब भी पी रहा था। उसने मोहनलाल से भी शराब पीने का आग्रह किया जिसे मोहनलाल ने नकार दिया। फिर रवि ने जिद पकड़ ली की जीजा शराब तो तुम्हें पीनी पड़ेगी। मोहनलाल ने सख्ती से मना कर दिया तो रवि ने गुस्से में आकर शराब की बोतल से गाड़ी के काँच पर जोर से प्रहार किया। इससे टेक्सी का फ्रन्ट का काँच टूट गया और रवि का हाथ भी लहूलुहान हो गया। रवि नशे मे धुत होकर मोहनलाल को गाली देने लगा था। मोहनलाल खुद को संयत कर रवि को गाड़ी में बिठाया और अपनी ससुराल बरखेड़ी में आ गया जहाँ उसकी पत्नी राधिका उससे झगड़ा कर पिछले सात दिन से मायके में रह रही थी। मोहनलाल के ससुर स्वरूप सिंह बाहर आ गए राधिका भी बाहर आई तो देखा कि मोहनलाल रवि को सहारा देकर टेक्सी से उतार रहा है। वो नशे में धुत था और मोहनलाल को गालियाँ बके जा रहा था। जब स्वरूप सिंह ने गाड़ी का टूटा हुआ काँच देखा और रवि का लहूलुहान हाथ देखा तो रवि द्वारा मोहन को दी जा रही गालियाँ सुनकर ये अंदाजा लगाया कि इनकी आपस में लड़ाई हुई है और मोहन ने ही रवि की ये हालत की है। वे गुस्से से आपे से बाहर हो गए राधिका भी आँखों से अंगारे बरसा रही थी। स्वरूप सिंह ने पूरी बात सुने बिना ही मोहनलाल को गाली बकते हुए कई थप्पड़ जड़ दिए। मोहनला अच्छी कदकाठी का ताकतवार इंसान था अगर वो स्वरूप सिंह को एक धक्का भी मार देता तो स्वरूप सिंह गिरकर तीन गुलाटी खाता। मगर मोहनलाल पिटता रहा और यही कहता रहा पापा मेरी बात तो सुनो मेरी इसमें कोई गलती नहीं है। मगर स्वरूप सिंह कुछ सुनने को ही तैयार नहीं था। बोला निकल जा इधर और फिर कभी यहाँ मत आना और अगर आया तो हाथ पैर तोड़ दूँगा तेरे। मोहन ने राधिका से साथ चलने को कहा तो वो भी चिल्लाकर बोली मुझे नहीं रहना तुम्हारे साथ मुझे तो तलाक लेना है। मोहनलाल मार खाने के बाद अपमान के कड़वे घूँट पीकर घर आ गया। मोहनलाल अलग किराये के मकान में रह रहा था। राधिका के कारण वो अपने माता पिता को छोड़कर अलग हुआ था। मोहनलाल की मम्मी कमला कुछ दिनों से मोहनलाल के साथ रह रही थीं। उनका रहना राधिका को पसंद नहीं था इसी कारण वो मोहन से झगड़कर मायके आई थी। और मोहन मना कर लाने के लिए ही तो अपनी ससुराल आया था। राधिका के लिए वो अपनी माँ को भी छोड़ने को तैयार हो गया था मगर राधिका ने साथ चलने से साफ इंकार कर दिया था। पाँच दिन बाद राधिका ने अपने दोनों बच्चों को भी मोहनलाल के पास यह कहकर भिजवा दिया कि अपने बच्चों को सम्भालो मैं कोई दहेज में इनको नहीं लाई थी। मोहन की माँ मोहन के साथ ही रह रहीं थीं। उन्होंने दोनों बच्चों को फौरन सम्भाल लिया और उन्हें दुलार करने लगीं। बेटे को समझाया पर उस पर कोई असर नही॔ हुआ। छः महीने बाद राधिका पुलिस लेकर आई और अपने बच्चों को जबरन अपने साथ ले गई। इससे बच्चों की पढ़ाई छूट गई थी। मोहन लाल बहुत दुखी दिखाई दे रहा था। माँ उस घड़ी में भी अपने बेटे के साथ थी। मोहन लाल का कोई कसूर नहीं था फिर भी सजा उसी को सबसे अधिक मिल रही थी। उधर मायके में राधिका घर की नौकरानी बनकर रह रही थी। दोनों बच्चों की भी पढ़ाई छूट गई थी। राधिका को अपनी भूल का अहसास हो गया था और अब वो झगड़ा खत्म करने का मन बनाने लगी थी। आखिर वो मोहन के साथ रहने का विचार कर रही थी। पापा तैयार हो गए तो रवि अड़ गया बोला पहले मुझे पाँच हजार रुपये दिलवाओ मेरी गाड़ी का काँच इसके कारण ही टूटा था। मोहनलाल ने अपनी गलती न होते हुए भी पाँच हजार रुपये रवि को देकर उसे शाँत किया था। घर आकर मोहन ने राधिका को सारी बात बताई तो उसे रवि पर बहुत गुस्सा आया। दोनों का पुनर्मिलन हो गया था यही खुशी की बात थी।
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
*******
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें