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कहानी: टेक्सी ड्राइवर

पिछले साल तक सतीश टेक्सी ड्राइवर था उसे मात्र पन्द्रह हज़ार रुपये वेतन मिल रहा था जिसमें उसके परिवार की गुज्रर बसर मुश्किल से चल रही थी पिछली दीपावली पर उसके मालिक सोहन ने उसके सामने एक प्रस्ताव रखा था जिसमें उसे या तो तीस हज़ार रुपये बोनस लेना था । या फिर उसको डाउन पेमेन्ट मानकर पन्द्रह हज़ार रुपये प्रतिमाह की किश्त पर वही टेक्सी खरीद लेना था जिसका वो ड्राइवर था। सतीश ने मालिक की बात मानकर वो टेक्सी ख़रीद ली जो उसके लिए लाभ का सौदा सिद्ध हुई आज वो उस टेक्सी की किश्त तो अदा कर ही चुका था। बल्कि इस दीपावली पर उसने एक नई टेक्सी भी खरीद ली थी। और इसके साथ ही एक ड्राइवर को भी रोज़गार दे दिया था।
सतीश जब टैक्सी ड्राइवर था तब उस की सोच यही थी की टेक्सी मालिक बनना उसके लिए असंभव है उसकी किस्मत में तो ड्राइवरी है पर जब टेक्सी मालिक सोहन ने उसे टेक्सी बेचने की बात कही तब उसने उसे मान तो लिया पर मन में यही डर था कि अगर टेक्सी नहीं चली तो हर महीने की पन्द्रह हज़ार रुपये की किश्त कैसे अदा करेगा और परिवार का खर्च कैसे चलाएगा लेकिन ऐसी कभी नौबत नहीं आई शुरू दिन से ही उसे काम मिलना शुरू हो गया वो खुद ही टेक्सी ड्राइवर था और मालिक भी खुद ही था वो इस बात से चकित था कि पहले महीने में ही उसे टेक्सी की किश्त चुकाने तथा सारे खर्च निकालने के बाद अस्सी हज़ार रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था इस आय ने उसका जीवन स्तर बदल दिया था। अब उसने बड़ा किराये का मकान ले लिया था दोनों बच्चों का एडमीशन सरकारी स्कूल से हटाकर प्राइवेट स्कूल में करा दिया था पत्नी को मँहगी साड़ी खरीद कर दी थी बच्चों का जन्मदिन अच्छे से मनाया था इस सबके बाद भी साल भर में सतीश के पास पूरे तीन लाख रुपये की बचत हुई थी जिसको डाउन पेमेन्ट के रूप में देकर सतीश ने शोरूम से नई टेक्सी खरीद ली थी नई टेक्सी को उस ने खुद चलाने का निर्णय लिया था तथा पुरानी टेक्सी चलाने के लिए रोशन को ड्राइवर के पद पर रख लिया था। अब उसे अच्छी तरह पता चल गया था कि ड्राइवर बने रहने में कोई लाभ नहीं है अगर जीवन में आगे बढ़ना है तो ऑनर बनने की रिस्क लेना ही होगा जो जोखिम उठाना जानते हैं किस्मत भी उन्हीं का साथ देती है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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