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कहानी: बागवानी छोड़कर

लखन बागवान ने जबसे बागवानी छोड़कर सब्जी फल फूल की दुकान लगाई थी तभी से वो सुखी और संपन्न जीवन जी रहा था। यह दुकान लगाए उसे तीन ही साल हुए थे और इस बीच उसने पक्का मकान भी बना लिया था और इस दीपावली पर नई कार भी खरीद ली थी। जबकि जब वो बागवानी करता था तब कर्ज में ही डूबा रहता था और हमेशा आभावों का जीवन जीता था। इस बार लखनलाल एवं उसके परिवार ने दीपावली का पर्व धूमधाम से मनाया था।
लखन बागवान के पास तीन एकड़ जमीन थी जिस पर वह तीन साल पूर्व तक फल, फूल और सब्जी उगाता था। तथा सब्जी मंडी में नीलामी में बेचकर अपना गुजर बसर करता था। एक बार की बात है वो तीन कट्टी हरी मिर्च नीलामी में बेचकर आया था जो बीस रूपये किलो के भाव से बिकी थी। सब्जी मंडी के बाहर उसने उत्सुकतावश फुटकर विक्रेता से हरी मिर्च का भाव पूछा तो उसने बताया ले लो सस्ती ही है सिर्फ दस रुपये कि सौ ग्राम। लखन ने हिसाब जोड़ा यानि सौ रूपये किलो। पाँच गुना अधिक दाम वो भी चंद कदम की दूरी पर जबकि वो अच्छी तरह जानता था कि सब्जी कितनी मेहनत से उगाई जाती है और लागत भी बहुत लगती है मगर दाम कभी अच्छे नहीं मिलते। इससे तो ये फुटकर व्यापारी अच्छे हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा। यह बात उसके दिमाग में खटक ही रही थी कि शाम को उसने फुटकर भुनी मूँगफली बेचने वाले से भाव पूछ लिया। उसने कहा बीस रुपये की पचास ग्राम यानि की चार सौ रुपये किलो जबकि पिछले हफ्ते वो पन्द्रह कट्टी मूँगफली थोक में नीलामी में चालीस रुपये किलो में बेच कर आया था। दस गुना अधिक कीमत में उसकी मूँगफली बाजार में बिक रही थी। लखनलाल को इन घटनाओं ने सोचने पर मज़बूर कर दिया। उसने भी सब्जी फुटकर में बेचने का निर्णय लिया। महानगर के बाजार में एक जगह उसे मिल गई किराये पर और वहाँ उसने अपनी सब्जी की दुकान लगा ली। उसकी सब्जी ताजी और अच्छी थी फुटकर में उसे अपनी सब्जी का भाव पाँच गुना अधिक मिला था। लखनलाल ने रोज सब्जी की दुकान लगाना शुरू कर दिया इसके साथ ही अपनी जमीन में सब्जी फल फूल की फसलें उगाना भी बंद कर दिया था। अब वो अपनी जमीन में सोयाबीन तथा गेहूँ की फसल बो रहा था। बाकी अब लखनलाल की रोज की दिनचर्या यही थी। अब वह सब्जी मंडी में रोज नीलामी के समय जाता और बोली लगाकर सब्जी खरीदता और फिर अपनी दुकान पर बेचता इससे उसे खूब मुनाफा होता। उसने इस आय से अपना पाँच लाख का कर्ज चुकता किया था। इसी आय से उसने पन्द्रह लाख रुपये खर्च कर अपना पक्का मकान बनवाया था और इस साल कार खरीद ली थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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