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व्यंग्य: पुस्तक प्रकाशन का जुनून

एक ओर जहाँ प्रकाशकों की भरमार हो गई है ।दूसरी ओर पुस्तक प्रकाशित कराने वालों की अच्छी संख्या भी हो गई है। महीने का ऐसा कोई रविवार खाली नहीं जाता जब किसी पुस्तकका कहीं विमोचन समारोह न हो ऐसे आयोजनों में एक जैसे दर्शक दिखाई देते हैं । मंच पर बैठी हुए एक जैसी बड़ी हस्तियाँ और?समीक्षक भी वही छँटे छँटाए एक समीक्षक अपनी समीक्षा में जाने कितवी किताबों को कालजयी सिद्ध कर चुके हैं। हर रविवार किसी न किसी किताब को कालजयी कृति बताते ही रहते है पुस्तक लेखक की तुलना बड़े साहित्यकारों से करने लगते हैं जिसकी पुस्तक का विमोचन हो रहा होता है उनका गुरूर देखने लायक होता है दर्शचों का ज्यादातर ध्यान कार्यक्रम के अंत में मिलने वाले स्वल्पाहार अथवा सहभोज पर अधिक होता है उसमें कई तो ऐसे होते हैं जो पूरे परिवार के साथ आते हैं और मुफ्त के डिनर का आनंद लेते हैं।
गए रविवार महेश विज्ञ जी की चौथी पुस्तक का विमोचन हुआ था उसमें वे खर्च हुए पैसे का हिसाब लगा रहे थे। जिसमें उनके पूरे चार लाख रुपये खर्च हो गए थे आधे पैसे तो समारोह में तथा अतिथियों की आवभगत में ही खर्च हो गए थे महेश जी समारोह की तैयारियों में महीने भर से बदहवास थे तब कहीं समारोह संपन्न हो सका था। उन्होंने किताब की तीन सौ प्रतियाँ अपने खर्च से छपवाई थी प्रकाशक ने तो अपना मुनाफा भी वसूल लिया था महेश जी ने किताब की कीमत आठ हजार रुपये रखी। ती जिसकी पन्द्रह प्रतियाँ उन्होंने निशुल्क रूप से मंच पर बैठी हस्तियों को भेंट की थी इसके बाद काउण्टर पर बिक्री के लिए रख दिया था उन्हें ऐसा लग रहा था कि सारी प्रतियाँ हाथों हाथ बिक जाएँगी पर मुफ्त की दावत उड़ाने वाले लोगों ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया दूसरे दिन उनकी पत्नी से इस बात को लेकर तीखी नौक झौंक हो गई पत्नी कह रही थी सारी प्रतियाँ धूल खा रही हैं पूरा एक कमरा भरा हुआ है बीस लाख खर्च कर चुके हो देखना यह किताबें हमारे बाद बच्चे कबाड़ी को बेच देंगे महेश जी कह रहे थे ऐसा थोड़ी होगा पत्नी कह रही थी देख लेना ऐसा ही होगा इस पर उनकी पत्नी से तीखी नौंक झौंक हो गई थी और उनका अच्छा भला मूड खराब हो गया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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