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व्यंगय: पत्नी का भाई

पुराने ज़माने की कहावत है कि मकान को खा गए आले और घर चो खा गए साले। अर्थात पुराने समय में घर की दीवाल बहुत मोटी होती थीं इतनी मोटी की उस मोटाई में अल्मारी भी बन जाती थी इससे गर की दीवाल कमजोर हो जाती थी चोरों को सेंध लगाने में मुश्किल नहीं होती थी।
इसी तरह यहाँ उन सालों के विषय में कहा गया है जो बहन के घर में बने रहते हैं यह भी परिवार को कमजोर करने भें बड़ी भूमिका निभाते हैं हाँलाकि सभी साले बुरे नहीं होते। लेकिन यहाँ बौरे सालों चर्चा की जा रही है । जिनसे जीजा परेशान रहते हैं।
रभेश का निकम्मा साला पाँच साल से उनके घर में रहकर उनका सुख चैन हराम किए हुए था। पत्नी अपने भाई का अंधा समर्थन करती थी उसकी बडी से बडी गलती छिपा दी जाती थी। रमेश जी का छोटा भाई दिनेश परीक्षा की तैयारी करने और परीक्षा देने के उद्देश्य से तीन महीने के लिए। आया था । लेकिन उनकी पत्नी तथा साले ने उसे तोन दिन भी नहीं टिकने दिया हारकर उसने कहीं कमरा किराये से ले लिया तब कहीं उसका पीछा छूटा। रमेश जी बोले जरूरत पढ़ने पर मैंने अपने भाई को पच्चीस हजार रुपये उधार दिए थे। यह हमारी पत्नी को नागवार गुजरा उसने हमें परेशान कर दिया आखिर उसने जब पैसे लौटाए तब कहीं पत्नी की रोज की चख चख से पीछा छूटा जबकि साला उनके बारह लाख रुपये डकार का बैठा था जिनके वापस आने की गुंजाइस भी नहीं थी। उसके बाद उनकी अपने भाई के खिलाफ एक शब्द कहना भी सहन नहीं कर पाती थी। रमेश जी के बडे भाई एक बार उनसे मिलने अए वे दस हजार रुपये के सामान भी उनके लिए लाए । इसके बाद भी उनकी पत्नी ने उन्हें पनीली चाय पिलाकर टरका दिया दो बिस्किप भी खाने को नहीं दिए जबचि उनका साला पाँच सालों से फ्री की रोटियाँ तोड रहा था आज तक एक रुपया भी कमाकर नहीं दिया था। फिर भी उसकी रोज खूब खातिरदारी हो रही थी। कुछ पत्नी के भाई तो ऐसे हैं जो अपने जीजा के पैसों को बेद्रर्दी। से खर्च करते हैंव मजाल है कि जीजा अपने साले के खिलाफ आवाज भी उठाई तो। उन्हें इसके भीषण परिणाम भोगना पड़े।  

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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