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व्यंग्य: मतलबी अपने वाले

पुराने नैतिक मूल्यों के क्षरण के इस दौर ऐसे मतलबी लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जो बिना मतलब के किसी से किसी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं रखते। जिससे इनका मतलब होता है उसका थूक तक झेलने को तत्पर हो जाते हैं यह फिर पक्के सेवा भावी बन जाते हैं इनका सेवाभाव देखने लायक होता है ।सामने वाला इनको चाहे जुतियाए चाहे गरियाए चाहे इनकी लाख बेइज्जती कर दे पर इनके चेहरे की मुस्कुराहट में परिवर्तन नही होता ।यह सब मतलब रहने तक सीभित रहता है ।मतलब निकल जाने पर यह लोग फिर उस तरफ मुड़कर भी नसीं देखते ये लोग पक्के अहसान फरामोश होते हैं ये चापलूस लोग योग्य लोगों के हकों पर डाका डालने में जरा भी संकोच नहीं करते।
जब यह बात हम अपने मित्र दिनेश से कर रहे थे तब करन खेड़ा गाँव के सरपंच हमारी बात बड़े गौर से सुन रहे थे वे हमारे पास आए और बोले आप बिल्कुल सही कह रहे हो ऐसे एक मतलबी अपने वाले से मैंने मुश्किल से पीछा छुड़ाया है उसने मेरी छवि का बहुत नाजायज फायदा उठाया यह सुनकर?हमारी जिज्ञासा बढी तब उन्होंने विस्तार से बताया हमारा सगा साला है बाबूलाल जो आजकल जेल की हवा खा रहा है । तीन साल पहले वो हम से कोई वास्ता नहीं रखता था मौका मिलने पर हमारी कटी करता था। जब हम सरपंच का चुनाव लड़ रहे थे तब वो हमारा छिपा हुआ सब से बड़ा विरोधी था। उसने हभारे बहुत वोट काटे । फिर भी जब हम चुनाव जीत गए तो उसे रंग बदलते देर नहीं लगी गिरगिट भी इतनी तेजी से रंग नहीं बदलता होगा जितनी तेजी से उसने रंग बदला था। वो फौरन हमारा खास बनकर आ गया और हम पे अपना अधिकार जताने लगा पत्नी के कहने में हमने उसे भाव देना शुरू कर दिया इसका उसने भरपूर फायदा उठाया वो हमारे नाम से दलाली करने लगा हमने उसे परे करने की बहुत कोशिश की पर वो तो ऐसा चिपका की हटाए नहीं हट रहा था हमारे द्वारा की गई बेइज्जती बर्दाशत कर रहा था फिर भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा था रिश्ते का नाजायज लाभ उठा रहा था उसने हमारी पत्नी को ढाल बना रखा था। वो तो साल भर पहले एक खूनी को शरण देने के कारण पुलिस के हत्थे चढ़ गया पुलिस ने उसके पुराने जुर्मों की फाइल भी खोल ली थी। उसने पुलिस पर खूब दवाब बनाने की कोशिश की पत्नी भी बोली आपके मंत्री जी से अच्छे संबंध हैं उनकी सहायता से मेरे बेकसूर भाई को छुड़वा दो हमने यह कहकर पल्ला झाड़ दिया की पुलिस इस मामले किसी की बात नहीं सुन रही है। उसे सजा हो गई तब कहीं हमारा उससे पीछा छूटा । 
समाज में ऐसे लोगों की बढ़ती हुई संख्या चिंतनीय है पर इसका समाधान यही है कि ऐसे लोगों को बिल्कुल भी भाव नहीं दिया छाए इसी में सबकी भलाई है अगर नैतिक मूल्यों की पुन्रस्थापना करना है तो यह करना ही पड़ेगा।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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