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व्यंग्य: मुगालता पालकर बैठे हुए

जो सामर्थ्यवान है हुनरमंद हैं उन्हें अपने आप पर विश्वास है वो कभी मुगालता नहीं पालते जो मुगालता पालते हैं उनमें सिवाय?मुगालते के और कुछ नहीं होता यह लोगों पर झूठा रौब जमाने का असफल प्रयास करते हैं। ये किसी का भी बड़े से बड़ा काम चुटकियों में कराने का दावा करते हैं जो ये कभी नहीं करा पाते एकाध बार लोग इनके शिकार भी हो जाते हैं । इसके बाद फिर उनकी बातों के जाल में नहीं फँसते।
ऐसे ही एक मुगालता पाले हुए दिनेश जी हैं उनकी पत्नी एक स्कूल में टीचर है वे खुद एक धेला बी नहीं कमाते पर बाते लाखों करोडों की करते हैं। अनजान लोग उनकी बात सुनकर उन्हें धन कुबेर समझ बैठते हैं जबकि उनकी जेब में सिंगल चाय के भी पैसे नहीं होते चाय वाला उन्हें उधार में चाय तक नहीं देता कभी कोई अक्ल का अंधा और गाँठ का पूरा इनके जाल में फँस जाए तो यह तब तक उसके धन पर मजे करते हैं। जब तक उस पर इनकी असलियत न खुल जाए असलियत खुलते ही वो इनसे कन्नी काट लेता है और ये दूसरे शिकार की खोज में जुट जाते हैं। ऐसे लोगों की न घर में इज्जत होती है न मोहल्ले में और ना ही बाज़ार में। ये अपना प्रचार खुद करते हैं चुनाव के समय दिनेश जी ने नेताजी को एक माला पहना दी थी। और नेताजी ने उन्हें मुस्कुरा कर देख लिया था इनके लिए यही काफी था। चुनाव जीतने के बाद जब नेताजी बने तब इन्होंने उनके खासम खास बनने का मुगालता पाल लिया इसका खूब प्रचार भी किया इनकी बातों में एक गरजमंद आ गया तथा इन्हें अपने खर्चे से मंत्री जी के बँग्ले पर ले गया। जहाँ सुरक्षा कर्मियों के डंडे इन पर पड़ते देख वो सब कुछ समझ गया और इन्हें रस्ते भर खूब गरियाता रहा । इन पर उसकी बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि ये सब सहन करने की इनकी आदत पड़ गई थी। इनकी पत्नी भी कभी इन से दस रुपये का सामान तक नहीं मँगाती थी पैसे लेकर हड़प जाना तो इनकी आदत में शुमार था। जाने कितने लोगों के पैसे वे अब तक हजम कर चुके हैं इसका किसी के पास कोई हिसाब नहीं है। मुगालता पाले हुए लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि उनमें आत्मविश्वास कूट कूट कर भरा है। पर भीतर से ये बहुत खोखले होते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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