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व्यंग्य: महत्वाकाँक्षा के गुलाम

अपनी अहमियत को दिखाने के लिए कई बार कुछ लोग हद से गुजर जाते हैं ऐसे लोग अपनी ही महत्वाकांक्षा के गुलाम होती है जो झूठी अहमियत उनके पास होती है उसे बनाये रखने के लिए ये लोग ओछे हथकंडे अपनाने भें पीछे नहीं हटते इनमें से ज्यादातर लोग योग्य नहीं होते लेकिन योग्य लोगों के हक पर डाका डालकर बैठे रहते हैं इनकी सारी शक्ति जीवन की सारी ऊर्जा इसी एक काम भें खर्च हो जाती है।
इसे उदाहरण के रूप में कहें तो विपुल और अखिल दो अलग अलग व्यक्ति हैं। जिसमें विपुल अपना कार्य पूरी मेहनत ईमानदारी और लगन से काम करता है जब तक काम परफेक्ट न हो जाए तब तक संतुष्ट नहीं होता जबकि विपुल अपना काम इतनी अच्छी तरह से नहीं करता पर जो करता है उसको श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए हर तरह के हथकण्डे अपनाता है खूब प्रचार करता है और कुछ झूठी तारीफें कुछ झूठे सम्मान पत्र कुछ फर्जी टिप्पणियाँ पाकर अपनी महत्वाकांक्षा को पुष्ट करके खुश हो जाता है वो विपुल को हिकारत से देखता है उसकी मेहनत को नजर अंदाज करता है। उसे अच्छे प्लेट फार्म पर पहुँचने नहीं देता। विपुल को चापलूसी करना नहीं आती जबकि अखिल चापलूसी करने में माहिर है। लेकिन वक्त तो आखिर इंसाफ करेगा ही है पिर अखिल जैसे लोगों की सारी चालाकियाँ और सारे हथकण्डे किसी काम के नहीं रहते तब विपुल के हुनर की कद्र होती है और अखिल जैसे लोग हारे हुए जुआरी की तरह विपुल के पक्ष में बेबसी से बाजी पलटी देखने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। ये महत्वाकांक्षी लोग चोर और डकैत भी होते हैं जो दूसरों के सृजन को चोरी कर अपना बताकर खूब वाहवाही लूटते हैं अपने आपको महान कलाकारों की विरासत का वारिस बताने वाले ये लोग बहुत जल्दी भूले बिसरे लोगों की श्रेणी में शामिल हो जाते हैं।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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