सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: गरीबो॔ के गुरूजी

आज के युग में गुरुजनों का सम्मान केवल दिखावा बनकर रह गया है कभी शिष्य की पहचान उनके गुरूजनों से होती थी आज गुरूजनों की पहचान शिष्यों से हो रही है। जिन गुरूजनों के पढाए हुए शिष्य ऊँचे पदों पर हैं या राजनीति के महारथी हैं उन गुरूजनों का सम्मान तो फिर भी बचा हुआ है पर जो गरीबों के गुरूजी हैं उनकी प्रतिष्ठा तो न के बराबर है उनमें से कई तो अपमान सहने के आदि हो गए हैं। कई अधिकारी तो इन गरीबों के गुरूजियों से बहुत बुरा व्यवहार करते हैं और तो और ऐसे अधिकारियों के चपरासी भी अपने आपको इन से खूब ऊँचा समझते हैं।
सुरेश जी एम एस सी बी एड करने के बाद सरकारी स्कूल में अतिथि शिक्षक के पद पर कार्यरत थे यह गरीबों के गुरूजियों का गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले वर्ग के लोगों जैसा तबका है। इनका सम्मान तो न के बराबर है। सुरेश जी एम एस सी टॉपर हैं बी एड में गोल्ड भेडल प्राप्त किया है फिर भी उन्हें उसी स्कूल के थर्ड डिवीजन से बी ए पास प्रधाना ध्यापक अपने चपरासी से भी कमतर समझते हैं क्योंकि चपरासी का वेतन अतिथि शिक्षक के वेतन से कई गुना ज्यादा है वे विभाग के स्थाई कर्मचारी हैं।।
दूसरे गरीबों के गुरूजी उमानाथ हाल ही में एक गरीबों के स्कूल में पदस्थ हुए थे । इसके पहले वे एक प्राइवेट स्कूल में थे वहाँ उनका बड़ा मान सम्भान था शहर के बड़े लोगों के बच्चों को वे पढ़ाते थे। अब गरीबों के गुरूजी बनकर उन्हें बड़ा अटपटा लग रहा था लोगों का रवैया बदल गया था।
उनका निरीक्षण करने विभाग के सबसे निचले स्तर के अधिकारी पहुँचे उन्होंने उनको खूब डराया धमकाया कुछ रुपयों की माँग की उमानाथ जी ने मना कर दिया इस पर वे आग बबूला हो गए उमानाथ जी से बोले अपनी औकात में रहो अचानक उमानाथ जी को याद आया कि उन्होंने प्राइवेट स्कूल में विधायक जी के सुपुत्र को पढ़ाया था। विधायक जी उन्हें जानते थे उमानाथ जी ने उन्हें फोन लगाकर सारी फात फताई इस पर विधायक जी ने उस निचले अधिकारी को तगड़ी डाँट पिलाई वो अधिकारी सॉरी बोलकर चला गया पाँच दिन बाद वो अपने वरिष्ठ अधिकारी को लेकर?आया वरिष्ठ अधिकारी बोले हम तुझे तेरी औकात दिखाने आए हैं। भूल जा उन प्राइवेट स्कूल के दिनों को अब तू गरीबों का शिक्षक है। हमारे सामने तेरी औकात नहीं है। इस बार उमानाथ जी ने फिर विधायक जी को फोन लगाया तो उन्होंने उठाया नहीं वो अधिकारी बोला उठाएँगे भी नहीं हमने उनको तेरी औकात बता दी है वे अब तक यही समझ रहे थे कि तू प्राइवेट स्कूल का शिक्षक है। लेकिन जब हमने तेरी हकीकत सुनाई तो वे तैश में आ गए और बोले गरीबों के गुरू हमारे किसी काम के नहीं। तुम्हें जो करना है करो। उमानाथ जी को नौकरी करना थी यह सोचकर उनके तेवर ढीले पड़ गए साहब ने जो औकात उन्हें दिखाई थी उन्होंने मान ली। अब वो रोज अपमान भरी ज़िंदगी जी रहे हैं।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...