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व्यंग्य: क्या वाकई शराफ़त का ज़माना नहीं है

एक भ्रष्ट राजस्व विभाग के कर्मी अक्सर कहते रहते थे कि शराफ़त का ज़माना नहीं ईमानदार भूखे मर रहे हैं और बेईमान मौज कर रहे हैं। वे अपने विभाग के अपने उस सहक्रमी की हँसी उड़ाते थे जो निहायत ईमानदार था बड़े साहब ने उसे लूप होल में डालकर उस पर काम का बोझ लाद दिया था और वे बिना ना नुकुर कर के अपने काम को पूरी निष्ठा और लगन से करने मेः जुटे रहते थे। 
      वे भ्रष्ट अधिकारी आखिर रिश्वत लेते हुए पकड़ा कर नौकरी से हाथ धो बैठे । आजकल जेल की हवा खा रहे हैं उनकी पत्नी कपडे सिलकर गृहस्थी चला रही है जिस दिन वे जेल जा रहे थे उसी दिन उनके ईमानदार सहकर्मी का नायब तहसीलदार के पद पर प्रमोशन हो गया था और सरकार ने उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी थी। जिसके वो हक़दार थे।
वे भ्रष्ट अधिकारी जब नौकरी पर थे तब कहा करते थे आज के मँहगाई के जमाने में वेतन के सहारे गुजारा करना मुश्किर हो गया है जबकि उन्हें एक लाख रुपये प्रतिमाह वेतन मिल रहा था। जिनसे वे रिश्वत लेते थे उनमें कई गरीब भी शामिल थे जो सालभर में भी एक लाख रुपये नहीं कमा पाते थे उनसे वे हजारों रुपये की रिश्वत झटक लेते थे वे महज दस हजार रुपये की रिश्वत लेते सुए पकडाए थे फिर भी उनको कोई अफसोस नहीं था ।
मामला रफा दफा कराने में उनका आलीशान मकान बिक गया मँहगी कार बिक गई जेवर बिक गए फिर भी वे सजा से बच नहीं सके नौकरी भी गई और जेल की हवा भी खाना पड रही है। आजकल के कई माँ बाप अपने बच्चों को नैतिकता की शिक्षा नही देते वे उन्हे स्वार्थी बनाते चपल चालाक और धूर्त बनाते हैं वो उन्हें झूठ बोलना सिखाते हैं वे रिश्वत खोरी को अच्छा बताते हैं जब उनके बच्चे बड़े होकर उन पर ही ये हथकण्डे अपनाते हैं तो दुखी होकर कहते हैं घोर कलियुग आ गया है औलादों में संस्कार नहीं रहे जब आपने संस्कार दिए ही नहीं तो संस्कार उनमें आएँ कहाँ से । आपने अगर बच्चों को शरीफ बनाया होता तो ऐसी नौबत नहों आती कुछ लोग ऐसे हैं जो उपदेश देने में माहिर होते हैं पर उन उपदेशों पर खुद सी अमल नहीं करते तो दूसरे क्या करेंगे। ऐसा नहीं है कि सारी दुनिया ही बुरे लोगों से भर गई हो अच्छाई अभी भी जिन्दा है और खूब फल फूल भी रही है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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