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व्यंग्य: आदतन बुरा चाहने वाले

कुछ लोग आदतन बुरा चाहने वाले सोते हैं वे किसी का भला होते हुए नहीं देख सकते ऐसे लोगों को किसी को मिटता हुआ देखकर बड़ा मज़ा आता है । यह झूठी सहानुभूति दिखाने में भाहिर होते हैं जबकि भीतर?भीतर वे ख़ुशी से गदगद हो रहे होते हैं तब इनसे बड़ा दुखी दुनिया कोई नहीं लगता जब इनके ऊपर कोई आफ़त आ जाती है यह भावना शून्य लोग होते हैं इनका हर्दय पत्थर से भी ज्यादा कठोर होता है।
रवि बाबू ने बहुत?बढिया मकान बनवाया था यह देखकर उनके पड़ोसी दिनेश के सीने पर साँप लोट रहा था रवि जी मकान के समने उनका मकान झुग्गी झोपड़ी की तरह लग रहा था रवि जी के गृह प्रवेश उत्सव की भव्यता को दिनेश सह नहीं सके और अकेले में जाकर फूट फूट कर रोते रहे थे उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि रवि जी ने कितनी मुश्किल से मकान बनाया गले गले तक कर्जे में डूब गए पाई पाई जोड़कर पैसे इकठ्ठे किए । दिनेश को दो साल बाद ख़ुश होने का मौका मिला जब रवि जी के मकान को गिराने के लिए बुल्डोजर आया दर असल हुआ यह था कि जिस पर मकान बना था वो प्लॉट विवादित था और प्रतिपक्ष केस जीत गया था। इधर रवि जी का मकान जमींदोज हो रहा था उधर दिनेश का ह्रदय खुशी सै फूला नहीं समा रहा था रवि जी के यहाँ चीख पुकार मची हुई थी और दिनेश जी अपने मकार में बैठे ठहाके लगा रहे थे। दिनेश जैसे लोग किसी दुखी मजबूर बेबस की हालत पर कभी तरस नहीं खाते बल्कि उनकी हँसी उड़ाते हैं। और किसी फलते फूलते इंसान को देखकर जलने लगते हैं। दिनेश जैसे लोग कभी सुखी नहीं रह सकते इन्हें किसी न किसी की तरक्की देखकर असहनीय दुख होता है और ऐसा प्रायः रोज ही होता रहता है। दिनेश जैसे लोग जीवन में अक्सर नाकामयाब होते हैं यह खुद तो कुछ कर नहीं पाते और दूसरों की उपलब्धि देखकर जल भुनकर खाक हो जाते हैं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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