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व्यंग्य : समाज सुधारने की चिंता में मोटे हुए लोग।

वो ज़माना कब का बीत गया जब समाज सुधार का काम करने वाले समाज सेवी दुबले पतले होते थे वे लोग अपना घर बार खेती बाडी सब कुछ बेचकर समाज सेवा करते थे । यह नया दौर है। इस दौर में कई समाज सेवी समाज सेवा करते करते खूब मुटिया गए हैं ।कई तो गरीबी रेखा को पार करके अमीरों की जमात में शामिल हो गए हैं ऐसे लोगों ने बेशकीमती जमीन हडप ली है सरकारी मकान हासिल कर लिया है।
हर साल लाखों रुपयों का अनुदान हड़प जाते हैं हैं और मुफ्त का माल खाकर मुटिया जाते हैं इनकी समाज सेवा के कारण गंदी बस्तियाँ सलामत हैं गरीबों की अच्छी खासी संख्या है।जो इन्हें समाज सेवा का अवसर प्रदान करती है।
शहर के एक समाज सेवी ने समाज सेवा के नाम पर शहर की बेशकीमती दो एकड़ जमीन हथिया ली थी और शानदार सरकारी बंग्ला भी एलाॅट करा लिया था आज उस जमीन से हर महीने वे लाखों रुपये कमा रहे थे निराश्रित भवन होटल में बदल गए थे सभागृह शादी हाल में और?गरीबों के लिए बनाई रसोई में भोजनालय चल रहे थे इसके नाम पर शासन से उन्हें लाखों रुपयों का अनुदान भी मिल रहा था वे शहर के वी वी आई पी थे उनके खिलाफ कोई कुछ बोल नहीं सकता था । समाज सेवा के क्षेत्र का भविष्य उज्जवल देखकर नौकरी पाने की उम्र से से ओवर एज हुआ बेरोजगार युवक अशोक पाँच साल पहले समाज सेवा की लाईन में आया था इन पाँच सालो में वो फर्श से अर्श पर पहुँच गया था जबकि पीड़ीत लोगों के हाल पहले से बदतर हो गए थे। अशोक मुफ्त में मिली दवाएँ तथा उन्य सामग्री बेचकर लाखों रुपया महीना कमा रहा था। हमने सुना कि वो बड़ा सरकारी सम्मान हासिल करने के प्रयास में है इसके लिए उसने पूरी सेटिंग भी कर ली है। कुछ लोग कह रहे हैं कि वो इस सम्मान का हकदार है।
हमें तो अब अखबार में छपने वाली उस ख़बर का इंतजार है जिसमें सम्मानों की घोषणा होगी उस सूची में यकीनन उनका नाम रहेगा ये अटल सत्य है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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