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व्यंग्य: चुटकुलेबाज बनाम नीरस उबाऊ कवि

नीरज क्लिष्ट जी नगर के स्वनामधन्य वरिष्ठ कवि थे जो अपनी नीरस और उबाऊ कविताओं के लिए कुख्यात थे उन्हें इसी बात का दुख था कि उनकी कविता का पारखी कोई पैदा ही नहीं हुआ था । यह बात सुनकर कोई कह दे कभी पैदा भी नहीं होगा तो वे सुनके भड़क जाते थे। एक बार किसी ने उनसे कह दिया कविता सुनाकर हम पर अत्याचार करने वाले आपकी कविता तो हमारे सिर से गुजर गई हम तो इसकी एक पंक्ति का अर्थ समझने में भी नाकामयाब रहे। आप ही अपनी कविता का अर्थ समझा दीजीहिए इस बात पर वे झगड़े पे उतारू हो गए । किसी ने कह दिया पूरी कविता नहीं एक पंक्ति का ही अर्थ बता दो। पर वो अर्थ बताने को तैयार नहीं हुए।
क्लिष्ट जी का अगर सबसे बड़ा कोई दुश्मन था तो वे थे हास्य कवि अजय प्रफुल्ल जी । अजय प्रफुल्य जी हमेशा श्रोताओं से घिरे रहत थे। और हँसी ठहाकों से भरा माहौल हो जाता था। क्लिष्ट जी अजय जी को कवि कुल का कलंक कहते थे। अजय जी निर्विवाद रंप से चुटकुले बाज थे कवि तो वे क्लिष्ट जी जैसे कवियों के प्रकोप से बचने के लिए बन गए थे। एक ओर अजय जी चुटकुले परोस परोस कर अच्छा खासा रुपया कमा रसे थे दूसरी तरफ कथित कालजयी कविताओं के रचयिता क्लिष्ट जी एक अदद श्रीता के लिए महीनों तक तरसते रहते थे।
कहने का आश्य है कि चुटकुले बाज कवियों की आलोचना करने वाले इन्हें कवि ही नहीं मानने वाले खुद क्या हैं।?अच्छी कविता सुनने वालों की आज भी कोई कमी नहीं है। सहज सरल सुबोध भाषा में भी अच्छी कविता की जा सकती है। मंचों पर एक ओर जहाँ चुटकुले बाज मनोरंजन के लिए बुलाए जाते हैं दूसरी ओर कई अच्छे एवं स्तरीय कवि। कविताओं का आनंद वेने के लिए बुलाए जाते हैं। अच्छी कविता का आज भी उतना ही महत्व है जितना पहले था । कविता के चहने वाले खत्म नहीं हुए स्तरीय कविता के नाम से उबाऊ कविता सुनाने वालों से जरूर दूर हो गए हं। ये उबाऊ कवि कभी इस पर ध्यान नहीं देते कि जिनके लिए वे कविता लिख रहे हैं उनको ही कविता समझ में नहीं आ रहि है तो फिर कविता लिखने का उद्देश्य ही क्या? आम आदमी की कविता कहने वाले इन कथित नीरस उबाउ कवि से इनका कोई लेना देना नहीं है। इनकी हिम्मत कभी अपनी पत्नी को कविता सुनाने की नहीं होती बच्चों को इसलिए नहीं सुनाते कि कहीं उनकी कविता सुनकर?उनका मानसिक संतुलन नहीं बिगड़ जाए। क्लिष्ट जी को आते देखकर लोग कहते हैं कि भंत भी भाग जाते हैं तो इंसान की बिसात ही क्या। क्लिष्ट जी की लंबी उम्र की दुआ करने वाले न के बराबर होने के बाद भी वे पूरी तरह स्वस्थ हैं तथा पूरे सौ साल तक जीने का दावा करते हैं। लोग उस दावे को सच भी मान बैठे हैं। एक बार क्लिष्ट जी बीमार हो गए और पाँच दिन अस्पताल भर्ती रहे थे तब अस्पताल के किसी स्टॉफ सदस्य ने क्लिष्ट जी के मुँह पर टेप चिपका दिया था तब कहीं उनका उपचार संभव हो सका था। इसमें अतिश्यॅक्ति हो सकती है। बात झूठी भी हो सकती है। पर मजे लेने वालों को ऐसी बातें फैलाने में बहुत मज़ा आता है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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