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व्यंग्य: सहानुभूति का लाभ लेने वाले

एक तरफ जहाँ दान धर्म दया करने वाले लोगों की कमी नहीं तो दूसरी ओर इसका लाभ उठाने वालों की भी कमी नहीं हैं कई दिव्यांग स्वाभिमानी होते हैं तो वे मेहनत से धन कमाकर अपना पेट भरते हैं जबकि कई चपल चालाक लोग नकली दिव्याँग बनकर भीख माँगते नजर आते हैं और अच्छी खासी रकम कमा लेते हैं। इनमें चंदा लेकर मजा करने वालों की भी अच्छी खासी संख्या है।
ऐसे ही एक सहकारी विभाग में नौकरी कर रहे प्रकाश ने बताया कि वो दैनिक वेतन भोगी के रूप भें नौकरी में आए थे इसके लिए उन्होंने जो हथकण्डा अपनाया वो जानकार हमें भी लगा कि अपना मतलब हल करने के लिए कोई इतना भी गिर सकता है वो बड़े साहब के पास गए तो बोले मैं अनाथ हूँ। बडी मुश्किल से मैंने पढ़ाई कि थोड़ी आपकी मेहरबानी हो जाए इसके साथ ही उन्होंने साहब के घर के चक्कर लगाने शुरू कर दिए। हारकर या तरस खाकर साहब ने उन्हें दैनिक वेतन भोगी बना लिया इसके बाद तो उन्होंने अपनी जड़ जमा ली और जल्दी परमानेन्ट भी हो गए फिर उन्होंने अपनी शादी में खूब दहेज लिया नौकरी करने वाली लड़की से शादी की खुद क्लर्क थे पर अपने आपको इंजीनियर बताया तथा लड़की वाले से जी भर के रुपये ऐंठे। ऐसे लोगों को अपने किए पर बिल्कुल अफसोस नहीं होता यह लोग गरीबों लाचारों वंचितों के हकों पर बडी चालाकी से डाका डालते हैं। 
ठंड के मौसम में बहुत से दयालू कंबल बाँटते हैं। लेकिन वे मुफ्त का कंबल लेने वाले उस कंबल को बेचकर फिर ठिठुरते नजर?आते हैं और फिर कोई तरस खाकर उन्हें कंबल दे देता सै और फिर वे उसे बेचकर ठिठुरते नजर आते हैं। हमने एक व्यक्ति को ठंड की एक रात में नगर में गश्त लगाते देखा उसका कोट फटा हुआ था। हमने कहा तुम्हें कोई कंबल दान नहीं करता वो बोला हमें कोई नहीं देता। फिर उसने एक कोने में चीथेड़े लपेटे एक आदमी की तरफ इशारा करके कहा इसे अब तक चालीस कंबल दान में मिल चुके हैं बिल्कुल?नए और गर्म और यह सबको बेचकर बैठा हुआ है। हमने कहा तुम्हीं इससे कंबल खरीद लेते वो बोला इतने पैसे कभी जुड़ ही नहीं पाए सरकार से हमें कोई पैसा नहीं मिलता गश्त करने के बदले लोग हमें बीस रुपये महीना देते हैं । इससे हमें आठ हजार रुपये मिलते हैं जिससे परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होता है कंबल खरीदने की कभी गुंजाइश ही लहीं रहती। हमने उसकी खुद्दारी पर उसको सलाम किया। जो अनुचित लाभ उठा रहे हैं। उनके प्रति कैसे भाव उत्पन्न होते हैं उन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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