सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: बारिश की मौज के पीछे का छिपा दुख

तालाब के किनारे पानी की उठती हुई लहरों का लुत्फ लेते वाले लोग भुट्टे खरीद कर खाते रिमझिम फुहारों में थोड़ी देर के लिए कार से निकलकर भीगते लोग उनका दुख कभी नहीं समझ पाते जिनके लिए बरसत आफत बनकर टूप पड़ती है।
तीन दिन की घोर बारिश के बाद नदी उफान पर आ गई थी इस दृश्य को देखने के लिए लोगों की भीड़ इकठ्ठी हो गई थी कई खाने पीने की दुकाने लगी थीं एक छोटी दुकान पर मक्के की फुली एक सत्तर वर्षीय बुजुर्ग बेच रहे थे वे परेशान थे उनसे किसी ने पूछ लिया तो उन्होंने बताया कि तीन दिन की बारिश ने राशन खत्म कर दिया कल रात से पूरा परिवार भूखा है उधार फूली के पैकेट लाकर बेच रहा हूँ अभी तक चालीस रुपये की बचत हुई है अगर तीस रुपये की बचत और हो गई तो घर में आज सब्जी रोटी बन जाएगी वरन नमक से रोटी खाकर गुजारा करना पड़ेगा। उनकी मजबूरी का फायदा एक रील बनाने वाले ने उठाया उनके हाथ में पन्द्रह सौ रुपये देकर रील बनवाई आटा सामान तथा तिरपाल देते हुए फोटो खिचवाई और रील बनाने के बाद सब वापस लेकर पचास रुपये देकर चलते बने वे बुजुर्ग पचास रुपये पाकर ही खुश हो गए और रील बनाने वाले वीडियो अपलोड कर लाखों वीयू लाइक बटोर चुके थे। बुजुर्ग यह सोचकर खुश हो रहे थे कि नमक से रोटी खाने की नौबत नहीं आएगी। ठेले पर जो भुट्टा बेच रहा था उसके कपड़े गीले थे । लेकिन किसी का ध्यान उसकी हालत पर?नहीं था सब भुट्टा खरीदकर बारिश का आनंद ले रहे थे और भुट्टा वाला मुफ्तखोरों और अवैध वसूली करने वालों के कारण दुखी थी झुग्गी में बारिश का पानी भर रहा था पिखले पाँच दिनों से वो त्रिपाल खरीदने के पैसे नहीं जुटा पा रसा था। एक सरकारी दफ्तर में किसान बारिश से गली फसल के नमूने लेकर अधिकारी से मिलने आए थे और अधिकारी उन्हें मुआवजा दिलाने की बात कर रसे थे फिर भी किसानों के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं आ सको थी वे भी भारी बारिश का सामना कर रहे थे। एक ऑफिस में बारिश के कारण काम नहीं था वहाँ पकौड़ों की पार्टी हो रही थी इसके साथ वे गरमागरम चाय का लुत्फ ले रहे थे वे भी बरसात के पीछे छिपे दुखों से या तो अनजान थे या अनजान बनने का दिखावा कर रहे थे।



*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...