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व्यंग्य : अहंकार के पहड़ पर बैठे हुए लोग

पाँच हज़ार वर्ग फीट की कोठी में अकेले रहने वाले सेवानिवत्त वरिष्ठ अधिकारी वर्मा जी की मौत अपने बेडरूम में हो गई थी उस समय?उनके पास कोई नहीं था तीन दिन बाद जब अखबार वाले को कुछ संदेह सुआ तब पुलिस को सूचना दी गई तब कहीं उनका शव निकाला गया शव मर्चूरी में रखा था उनका बड़ा बेटा आलोक जर्मनी में नौकरी कर रहा बेटी प्राची आस्टूरेलिया में नौकरी कर रही थी जब उनको यह सूचना दी गई तो उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि हम नहीं आ सकते उनके पड़ोसियों से किसी प्रकार के कोई संबंध नहीं थे वे हद दर्जे के अहंकारी थे हारकर पुलिस तथा नगर निगम को उनका अंतिम संस्कार लावारिस की तरह करना पड़ा न उनकी तेरहवीं हुई न कोई पूजा पाठ उनकी मौत की कहीं कोई चर्चा भी नहीं हुई थी।
वर्मा जी बड़े अक्छड़ अधिकारी थे उन्हें कभी किसी ने हँसते नहीं देखा था अपने बच्चों से भी वे बात नहीं करते थे उनके दोनों बच्चे उनकी पत्नी माया से भी बात नहीं कर पाते थे वो किटी पार्टी तथा पार्टियों एवं क्लब में रमी रहती थी बच्चों का उनसे कोई भावनात्मक लगाव नहीं था । उन्होने बच्चे को मँहगे तथा सबसे अच्छे स्कूलों में पढ़ाया जहाँ संस्कारों की शिक्षा नही दी जाती थी बच्चे खूब पढ़े विदेश में उनकी पढ़ाई कराई गई और वे वहीं पर नौकरी करने लगे वहीं उन्होंने शादी भी कर ली । जब वर्मा जी रिटायर हुए तो जो सरकारी कर्मी उनके यहाँ काम कर रहे थे वे चले गए जो नौकर लगाए वे उनका अक्खड़ स्वभाव सह वहीं पाए और नौकरी छोड़कर चले गए उनकी पत्नी माया का निधन दो साल?पहले हो गया था उसके अंतिम संस्कार में भी बच्चे नहीं आए थे वर्मा जी ने ही उनकी उत्तर क्रिया की थे और उनके शव को तो अग्नि देने वाला कोई अपना तक नहीं मिला था। दूसरी ओर उनके ऑफिस में चपरासी की नौकरी करने वाला सेवाराम था आज उसकी उनसे बड़ी कोठी में अपने बहू बेटा नाती पोतों के साथ मजे से रह रहा था वो एक लोक प्रिय इंसान था और सभी के बीच हिल भिलकर रहते हुए मजे से अपना बुढ़ापा काट रहा था। सेवाराम का भी एक ही लड़का था नीरज जो बिल्डर था और खूब रुपया कमा रहा था नीरज की पढ़ाई सरकारी स्कूल में हुई थी जब पोली टेक्निक से उसने सिविल में डिप्लोमा किया तब उसी दौरान उसने नौकरी भी कर ली थी तब सेवाराम एक कभरे के सरकारी आवास में रहते थे आज उनके पास आठ हजार वर्ग फीट में बनी हुई कोठी थी जिसमें स्वीमिंग पूल भी था। नीरज ने अंश कालीन कॉलेज से बी ई किया था उसने मजदूर से लेकर मिस्त्री पलम्बर तथा इलेक्ट्रीशियन का काम भी किया था बी ई करने के बाद वो साइट इंजीनियर बन गया था फिर ठेकेदार इसके बाद बिल्डर आठ सालों की मेहनत से वो शहर के अरबपति लोगों की सूची में शामिल हो गया था वो संस्कार वान था। मिलनसार और परोपकारी था माता पिता की सेवा करना अपना धर्म मानता था। उनका पूरा परिवार खुशहाल?था सब एक साथ प्रेम से रहते थे। 
इस अहंकार ने वर्मा जी जैसे लोगों को सभी से अलग थलग कर दिया है । यह समाज में घुल मिल नहीं पा रहे हैं डिप्रेशन के शिकार होकर अपनी दवाइयों मे खूब रुपये खर्च कर रहे हैं और दौलतमंद होकर बी बिल्कुल सुखी नहीं हैं। 

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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