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व्यंग्य: गुरू घंटाल की सेवा का कड़वा फल

यह सत्य?है कि अच्छे गुरू और अच्छे उस्तादों की कभी कमी नहीं रही किसी शिष्य को अच्छे गुरू मिल?जाएँ उससे बड़ा कोई सौभाग्यशाली नहीं होता। मगर यह अच्छे गुरू या तो मिलते नहीं या ढूँढते नहीं अच्छे गुरू के साथ साथ अच्छा शिष्य भी होना जरूरी है पर होता यह है कि अच्छे शिष्य को गुरूघंटाल टाइप के गुरू मिल?जाते हैं और वे शिष्य का समय तथा पैसा बर्बाद करते रहते हैं। दसरी ओर खराब शिष को अगर अच्छे गुरू मिल भी जाएँ तो भी उस शिष्य का भला नहीं हो पाता ऐसा शिष्य अपने गुरू की सख्ती को सह नहीं पाता और छोड़कर चला जाता है।
एक अच्छे शिष्य रवि ने पूरे दो साल एक गुरंघंटाल से गिटार सीखने में गँवा दिए उस कथित गुरू ने पैसे खूब वसूले खूब सेवा भी ली और सिखाया कुछ भी नहीं। हारकर उस शिष्य ने गुरू का साथ छोड़ दिया उसने क्या साथ छोड़ा गुरू ने ही उससे यह कहकर किनारा कर लिया कि तुम गिटार कभी नहीं सीख सकते कोई दूसरा काम धंधा करो संगीत तुम्हारे वश का नहीं उस शिष्य ने भी उनकी बात सत्य मानकर गिटार?बजाना छोड़ दिया आखिर में गुरं घंटाल ने उस शिषूय का मँहगा गिटार मुफ्त में ऐंठ लिया और उसे मँहगे दामों पर अपने एक मासूम नवजात शिष्य को बेच दिया।
हमारी शहर के एक अच्छे शायर से बात हुई उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने उस्ताद को दिया कहा कि आज भी वे अपना कोई शेर बिना उनको दिखाए नहीं कहते। दूसरी और एक चलते पूर्जे उनके शागिर्द भी मिले जो अपने अच्छे उस्ताद से कुछ भी नहीं सीख सके उनकी सख्ती से तंग आकर एक गुरं घंटाल की शरण में चले गए गुरघंटाल ने उन्हें कुछ सिखाया तो नहीं पर?अपनी संस्था का उपाध्यक्ष बना दिया अब उनका समय बड़े साहित्यकारों की आवभगत एवं कार्यक्रमों के आयोजन में गुजर रहा है घर में शाल सम्मान पत्रों के ढेर लगे हुए हैं मोमेन्टो से अल्मारी भर गई है उनकी कई साझा काव्य संग्रहों मे बेसिर पैर की कवताए छप गई हैं और वे शहर?के स्वघोषित वरिष्ठ साहित्यकार बन गए हैं और पैसे देकर कार्यक्रमों की अध्यक्षता करते हुए अथवा मंच पर अतिथि के रूप में विराजमान होकर हाल में बैठे हुओं को हिकारत से देखते हैं। यह सोचते हैं कि ऐसा कर के उन्होंने अपना साहित्य में स्थान ऊँचा कर लिया है पर ऐसा होता नहीं है आने वाले समय में उनकी जगह और कोई ले लेगा और वे गुमनामी के अंधेरे में खो जाएँगे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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