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व्यंग्य : दुर्भावना का दंश

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अकारण ही किसी से दुश्मनी करने लगते पर उसे जाहिर नहीं होने देते। तथा दुर्भावना को पाले रहते हैं और मौके की ताक भें रसते हैं मौका मिलते ही ये दंश चुभोकर अपना सारा विष उड़ेल देते हैं पीड़ित यह सोचकर हैरान होता है कि आखिर इसने किस बात का बदला निकाला है।
महेश जी जीवन भर नेक और भले इंसान बनकर रहे इसके विपरीत उनका परिचित दिनेश ने बुराइयों से नाता जोड़ लिया । दोनों ने एक साथ मिल में नौकरी शुरू की थी।। महेश जी अपनी मेहनत और लगन तथा निष्ठा के दम पर तीन साल में ही सुपर वाइजर बना दिए गए । दिनेश को उसकी हरकतों के कारण नौकरी से निकाल दिया गया इसके बाद उसने अपराध की दुनिया में कदम रख दिया उसका ज्यादातर?समय जेल में कटने लगा समय के साथ महेश जी का बेटा बड़ा हुआ। वो भी मिल में नौकरी करने लगा था सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन एकहदिन रोहित दिनेश के संपर्क में आ गया उसे महेश से बदला निकालने का अवसर मिल गया। उसने रोहित को अपने पक्ष में करके उसे नशे का आदि बना दिया कई बुरी आदत डाल दी वो दिनेश को अपना आदर्श मानने लगा तथा सीधे सादे पिताजी को विलेन समझने लगा रोज शराब पीकर पिता के साथ दुर्व्यवहार करना उसकी आदत में शामिल हो गया था। नौकरी उसने छोड़ दी थी तथा आवारा घूमता रहता था। महेश जी को दिनेश ने डंक मार दिया जिससे महेश जी न खत्म होने वाली असहनीय पीड़ा को झेलने के लिए विवश थे। । 
जो जीवन में कुछ कर नहीं पाते बार बार असफल होते हैं वे सफल लोगों से नफ़रत करने लगते हैं। और फिर उनको नीचा दिखाने के अवसर ढूँढते रहते हैं।वे गलत तरीके से धन कमाने के प्रयास करते हैं तो उसमें भी सफल नहीं हो पाते ।यतो वे सफल लोगों की बुराई करना शुरू कर देते हैं। जिससे उन्हें हासिल कुठ भी नहीं होता।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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