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ऊँची नीची फाँकने वाले(व्यंग्य)

ऐसे बहुत से लोग हैं जिनकी जेब में चाय पीने तक के पैसे नहीं होते लेकिन बातें ऐसी करते हैं जैसे वे खानदानी रईस हों। घर में नहीं हैं दाने और अम्मा चली भुँजाने वाली जैसे दिखावा करने वाले नमक डालकर उबला हुआ दलिया खाकर आकर यह कहते हैं कि वे खीर खाकर आ रहे हैं। इनसे बातों में कोई जीत नहीं सकता। इनकी बड़े बड़े नेताओं से पहचान होती है। सारे फिल्मी कलाकारों से इनका याराना निकलता है। इनका खानदान बहुत ऊँचा है। इनकी हवेली इतनी ऊँची है कि अगर उसे सिर उठाकर देखो तो सिर की टोपी गिर जाए।
ऐसी झूठी बातें करने में इन्हें जरा भी संकोच नहीं होता। ऐसा ही एक खानदानी रईस ऊँचे खानदान का बड़ी हवेली वाला फेंकू एक प्राइवेट अस्पताल में बारह हजार रुपये महीने पर वार्ड ब्वाय की नौकरी कर रहा था। पन्द्रह सौ रुपये के एक किराये के मकान में अपने चार बच्चों के परिवार के साथ रह रहा था। बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे जो दोपहर का खाना स्कूल में खाकर आते थे और जिस दिन उन्हें छुट्टी मिलती थी उस दिन उन्हें घर पर भी खाना नहीं मिलता था। उसका नाम राकेश था आज चाय की गुमठी वाले से उसकी जोरदार बहस हो रही थी। उसकी चार चाय के पैसे राकेश ने चार महोने से नहीं दिए थे। राकेश उससे कह रहा था तू समझता क्या है मुझे मेरे सामने तेरे जैसों की क्या औकात है। खानदानी रईस हूँ तेरे जैसे कई लोगों को खरीद लूँ। और वो चायवाला कह रहा था होंगे आप खानदानी रईस मुझे इससे क्या मतलब बस मेरे चाय के पैसे दे दो बात खत्म। लेकिन राकेश फिर भी चाय के पैसे नहीं दे रहा था। हाथापाई कि तक नौबत आ गई थी। तभी राकेश के सहकर्मी ने चाय के पैसे देकर मामला रफा दफा किया। संतोष उसकी औकात जानता था दोनों एक ही गाँव के थे। राकेश के पिता मजदूर थे और एक छोटी सी झोपड़ी में रहते थे। राकेश सात हजार रुपये हर महीने गाँव भैजता था और पाँच हजार रुपये में अपना परिवार का खर्च मुश्किल से चला रहा था। संतोष उसकी असलियत जानता था इसलिए कुछ नहीं बोला। संतोष कह रहा था कि ये अपने गाँव में सबसे यही कहता था कि वो शहर के अस्पताल में मेडिकल ऑफिसर है। ऐसी ऊँची नीची हाँकने वाले लोग साहब के सामने भीगी बिल्ली बन जाते हैं और उनकी लताड़ सुनकर भी उनसे मिमियाते रहते हैं। ऐसे फाँकू लोगों की बात सुनकर लोग जरा देर में ही ऊब जाते हैं और बड़ी सफाई से कन्नी काट जाते हैं। जब तक कोई इनके सच को नहीं जान लेता तब तक इनके रौब में रहता है बाद में वो भी इनको भाव नहीं देता। तब ये किसी और को ढूँढकर उससे दोस्ती गाँठकर अपनी झूठी रईसी का बखान करने लगता है। ऐसे लोगों को कोई न कोई मिल ही जाता है इनकी बकवास बातें सुनने के लिए।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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