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व्यंग्य: दूसरों की सफलता पर कुढ़ने वाले

प्रायः हर काम में असफल रहने वाले चंचल प्रवृत्ति के लोग दूसरों की सफलता को सहन नहीं कर पाते और मन ही मन कुढ़ते रहते हैं कोई इनके सामने किसी सफल व्यक्ति की तारीफ कर दे तो ये आपे से बाहर हो जाते हैं अपनी भड़ास निकाल लेते हैं इनका मानना है कि आज के ज़माने में सफलत गलत तरीके से मिलती है मेहनत धैर्य रखकर लगन से काम करने वालों को भी सफलता नहीं मिलती और इसके लिए वे अपना उदाहरण देकर कहते हैं कि हमने सफल होने के लिए क्या नहीं किया बस गलत तरीके नहीं अपनाए इसी से सपलता हमसे हमेशा दूर रही।
ऐसे ही शहर की झुग्गी बस्ती में रहने वाले मज़दूर सोहन लाल हैं वो अगर सबसे अधिक किसी को देखकर कुढ़ते हैं तो वो उनका बचपन का दोस्त विनोद सिंह है। विनोद सिंह आज शहर का धनाढय व्यक्ति है। जबकि विनोद भी सोहनलाल के गाँव का ही था सोहनलाल ही उसे शहर लाया था । सोहनलाल ने ही उसे दिहाडी पर लछवाया था। विनोद ने दिन रात घोर परिश्रम किया मज़दूर से मिस्त्री बना मिस्त्री से सुपर वायजर। फिर ठेकेदार और आजकल शहर का जाना माना बिल्डर है। उसके पास कितनी ही लक्जरी कारे हैं जबकि सोहनलाल के पास खटारा सायकिल है जिसे वो चलाता कम है घसीटता ज्यादा है।
विनोद की चमचमाती कार उसके सबसे बड़े दुख का कारण बनी रहती है। वो दूसरों के सामने विनोद की जी भर के बुराइयाँ करता है। फिर भी उसका मन उससे कभी नहीं भरता। था। जबकि सच बात तो यह है कि विनोद ने हर अवसर का लाभ उठाया था। और सोहन लाल ने जीवन भर अवसर गँवाने के अलावा कोई और काम नहीं किया था ।सही प्रयास कर के मिली सफलता ख़ुशी का कारण बन जाती है ।ऐसे लोग कभी नहीं सुधरते आखिरी तक भी उनकी विचार धारा नहीं बदलती है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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