एक पुरानी कहावत है घर में नहीं हैं दाने अम्मा चली भुँजाने । चाहे भले ही उसने अपनी ओली में कंकर बाँध रखे हों कौन ओली खोलकर देखने वाला है? लोग तो यही समझेंगे अम्मा दानों को भुँजाने भाड़ में ले जा रही हैं उनकी फूली पड़वा के लाएगी ।
ऐसे ही घर में महेरी खाकर मूँछ पर चावल चिपकाकर घर से भरपेट खीर खाने की बात कहने वाले बड़बोले अपनी अमीरी का झूठा बखान कर रौब जमाने की कोशिश करते हैं।
ऐसे ही यू पी से आए बाबूलाल जी एक फेक्टरी में अठारह हजार रुपये की नौकरी कर रहे थे ।एक दिन अपने साथी मजदूरों से कह रहे थे । मुझे ऐसा वैसा मत समझना खानदानी रईस हं दो सौ एकड़ जमीन है इतना बड़ा मकान है कि अगर सबसे ऊपर का हिस्सा नीचे से देखो तो सिर की टोपी निकलकर गिर जाए इस फेक्टरी को तो चुटकी बजाते हुए खरीद सकता हूँ। तभी एक ने कहा कि फिर एक कमरे के मकान में किराये से क्यों रह रहे हो तो कहने लगे अपनी खुद्दारी के कारण पिताजी से झगड़ा हो गया इस लिए मजदूरी कर रहा हूँ जबकि मेरे यहाँ ही दो सौ लोग काम करते हैं। हमने सबको रहने के लिए अच्छे मकान दे रखे हैं। तभी उनके गाँव का साथी राकेश आ गया तो उन्होंने बात बदल दी और राकेश के साथ बाहर निकल आए। राकेश ने कहा तुम्हारी औकात में अच्छी तरह जानता हूँ दूसरों की चाय बिस्किट का सेवन कर कब तक अपनी झूठी रईसी का रौब जमाओगे । बारह हजार रुपये गाँव भैज देते हो तब कहीं तुम्हारे माता पिता भाई भतीजों को महीने भर भरपेट भोजन मिलता है। और तुम डेढ़ हजार रुपये मकान किराये के देने के बाद साढ़े चार हजार रुपये के साथ अपनी पत्नी और चार बच्चों का नमक रोटी खिलाकर पेट भरते हो और रौब करोड़पति अमीरों जैसा झाड़ते है ये लोग आखिर कब तक तुम्हें मुफ्त की चाय पिलाएँगे। मुझे मालूम है तुमने कैसे गिड़गिड़ाकर मालिक के पैरों में गिरकर नौकरी माँगी थी। राकेश की बात सुनकर वे कुछ नहीं बोले क्योंकि राकेश उनकी औकात अच्छी तरह जानता था उसे मालूम था कि गाँव में उसके परिजन टूटे छप्पर वाली झोपड़ी में रह रहे हैं।
इसी तरह एक स्वनामधन्य लेखक अपने आपको सर्वाधिक प्रतिष्ठित सर्वाधिक चर्चित बताकर अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू बनते हैं। नवोदितों पर झूठा रौब झाड़ने में उन्हें बहुत मजा आता है।
रोशन जी घर में बैठे फुरसत में मक्खी मार रहे थे तभी किसी का फोन आया तो उससे कहने लगे एक मिनट की भी फुरसत नहीं है इतना काम है। पत्नी उनकी बात सुनकर गुस्से से उन्हें देख रही थी वो एक हफ्ते से काली चाय पी रही थी क्योंकि रोशन के पास न काम था और न पैसे जिस से की वो दंध खरीद सके। यह लोग ज्यादातर गरीबों के सामने अपनी झूठी अमीरी का रौब दिखाते हैं जो उनकी औकात जानता है उसके सामने ये भीगी बिल्ली बन जाते हैं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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