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व्यंगय : निनयानवे का फेर

धन कमाने के अंधे मोह ने इंसान को इंसान के प्रति बड़ा क्रूर और निर्मम बना दिया है जज्बातों की कोई कीमत नहीं रह गई है। दफ्तर में रिश्वत लेता कर्मी इस पर तनिक भी विचार नहीं करता कि उसे जो सरकार वेतन दे रही है वो पर्याप्त है।
एक ऑफिस के बाबू जिनको नब्बे हजार रुपये वेतन मिल रहा था वे मात्र तीन हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़ा गए। और अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे। जेल की हवा खाकर आने के बाद अब तनकी हालत बड़ी दयनीय हो गई जिनके लिए वे अनुचित तरीके से धन कमाकर उनकी मौज करा रहे थे उन्होंने उन्हें दो वक्त की रोटी देने से बी इंकार कर दिया और घर से निकाल दिया फिर भी इंसान सबक नहीं लेता रिश्वत लेने वाले पकड़ा जाते हैं फिर भी बाकी रिश्वत लेने वाले रिश्वत लेने से बाज नहीं आते।
वो बात अब पुरानी हो गई जिसमें कहा जाता था कि रिश्वत लेते हुए पकड़ा गए तो रिश्वत देकर छूट जाएँगे लेकिन सोशल मीडिया के दौर में अब यह संभव नहीं है। रिश्वत लेकर अकूत धन कमाने वाले एक वरिष्ठतम अधिकारी पकड़ा गए । मामला रफा दफा कराने में सब कुछ चला गया सारा पैसा गहने जेवर चले गए फिर भी सजा से नहीं बच सके। वे ही वरिष्ठतम अधिकारी रहे । बुरे हाल में भटक रहे थे उन्हें अधिनस्थ रहे एक अदना से कर्मचारी विनोद जोशी ने पहचान लिया वो उन्हें अपने घर लाए उन्हें भरपेट खाना खिलाया। और यहाँ तक कह दिया आप हमारे साथ ही रहो लेकिन वे कब घर से निकल गए यह किसी को पता ही नहीं चला। विनोद जोशी को उन्होंने खूब परेशान किया था वो उनकी ईमानदारी से चिढ़े हुए रहते थे और परेशान करते थे । आज विनोद जी एक खुशहाल जीवन जी रहे थे। और वे अधिकारी अपनों के द्वारा ही भुला दिए गए थे। हमने यह बाउ एक रिश्वत खोर को बताई तो उसने वही घिसा पिटा जवाब दिया आज के इस मँहगाई के जमाने केवल वेतन के सहारे रहकर जीवन यापन मुश्किल है । हमने कहा रिश्वत किनके लिए लेते हो वे बोले अपने बीवी बच्चों के सुख के लिए। हमने उन्हें दो खबरे पढ़चर सुनाई पहली खबर में धन जेवर के बँटवार के विवाद में एक माँ के बेटों ने अपनी माँ की अर्थी को तब तक चिता पर नहीं रखने दिया जब तक उनका बँटवारा नहीं हो गया। दूसरी खबर अपने दोनों बेटों को अपनी संप्पति ति का बँटवारा कर चुके माखन लाल के शव को उनके दो बेटों ने दो बराबर टुकड़े कर अलग अलग चिता पर जलाया। मृत देह को दो हिस्सों में काटकर बाँटना साधारण आदमीं के वश की बात नहीं। इस घटना को सुनने के बाद भी उन्होंने रिश्वत लेना बंद नहीं किया था। रिश्वत लेना उनकी आदत बन गई थी जिसके बिना उन्हें चैन नहीं मिलता था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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